राजकोषीय घाटा vs राजस्व घाटा (Fiscal Deficit vs Revenue Deficit): अंतर, सूत्र, उदाहरण और FRBM अधिनियम

राजकोषीय घाटा vs राजस्व घाटा(Fiscal Deficit vs Revenue Deficit): जब सरकार की जेब में छेद हो जाए
राजकोषीय घाटा vs राजस्व घाटा (Fiscal Deficit vs Revenue Deficit): अंतर, सूत्र, उदाहरण और FRBM अधिनियम

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 फरवरी का महीना। संसद में बजट पेश होने वाला है। वित्त मंत्रालय के एक कमरे में अधिकारी आखिरी गणनाएं कर रहे हैं। एक कनिष्ठ अधिकारी चिंतित लग रहा है।

"सर, हमारा राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद के 5.8% पर पहुंच रहा है। राजकोषीय उत्तरदायित्व अधिनियम का लक्ष्य तो 3% है।"

वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं - "यह तो फिर भी ठीक है। असली चिंता की बात है राजस्व घाटा। वह सकल घरेलू उत्पाद के 3.5% पर है। मतलब हम रोज के खर्चों के लिए भी उधार ले रहे हैं।"

"लेकिन सर, दोनों में फर्क क्या है? दोनों घाटे ही तो हैं?"

"बेटा, फर्क बहुत है। राजकोषीय घाटा बताता है कि हमने कुल कितना उधार लिया। लेकिन राजस्व घाटा बताता है कि हम उस उधार का कितना हिस्सा उपभोग में बर्बाद कर रहे हैं। अगर राजस्व घाटा ज्यादा है तो मतलब हम संपत्तियां नहीं बना रहे, सिर्फ खर्च कर रहे हैं।"

यही है राजकोषीय घाटा और राजस्व घाटा की पहेली। दोनों घाटे हैं, दोनों खतरनाक हो सकते हैं, लेकिन दोनों का मतलब अलग है। आज हम इन दोनों को गहराई से समझेंगे।


पहले समझें - सरकार का बजट कैसे बनता है

किसी भी घाटे को समझने से पहले यह जानना जरूरी है कि सरकार के पास पैसा कहां से आता है और कहां जाता है।

सरकार की आय (राजस्व प्राप्तियां)

कर राजस्व: आयकर, वस्तु एवं सेवा कर, सीमा शुल्क, निगम कर - ये सब। यह सबसे बड़ा स्रोत है।

गैर-कर राजस्व: सरकारी कंपनियों से लाभांश, ब्याज की आय, शुल्क और जुर्माने, स्पेक्ट्रम नीलामी से आय।

सरकार का खर्च

राजस्व व्यय: रोजमर्रा के खर्च - सरकारी कर्मचारियों की वेतन, पेंशन, सब्सिडी, ब्याज भुगतान, रखरखाव। ये अनुत्पादक खर्च हैं - इनसे कोई संपत्ति नहीं बनती।

पूंजीगत व्यय: निवेश - सड़कें, पुल, रेलवे, बांध, स्कूल, अस्पताल। ये उत्पादक खर्च हैं - इनसे संपत्तियां बनती हैं जो भविष्य में भी काम आएंगी।


राजस्व घाटा क्या है - रोज के खर्च का संकट

राजस्व घाटा तब होता है जब सरकार का राजस्व व्यय, उसकी राजस्व प्राप्तियों से ज्यादा हो जाता है।

सूत्र: राजस्व घाटा = राजस्व व्यय - राजस्व प्राप्तियां

सरल भाषा में - सरकार की जो नियमित आय है (कर, ब्याज, शुल्क), वह उसके नियमित खर्चों (वेतन, सब्सिडी, ब्याज) को पूरा नहीं कर पा रही।

A) राजस्व घाटे की विशेषताएं

1. उपभोग का घाटा: यह बताता है कि सरकार उपभोग पर कितना ज्यादा खर्च कर रही है। यह उत्पादक निवेश नहीं है।

2. संपत्ति नहीं बनती: राजस्व घाटे का मतलब है कि सरकार अपनी नियमित आय से भी रोजमर्रा के खर्च नहीं चला पा रही। उसे इसके लिए भी उधार लेना पड़ रहा है।

3. खतरनाक संकेत: अगर राजस्व घाटा लगातार बढ़ता रहे तो यह बहुत खतरनाक है। इसका मतलब है कि सरकार अपनी आय से कम चला रही है, बाकी सब उधारी है।

4. भविष्य पर बोझ: राजस्व घाटे से कोई संपत्ति नहीं बनती, सिर्फ कर्ज बढ़ता है। यह कर्ज भविष्य की पीढ़ियों को चुकाना होगा।

B) राजस्व घाटे के कारण

1. सब्सिडी का बोझ: खाद्य सब्सिडी, उर्वरक सब्सिडी, पेट्रोलियम सब्सिडी - ये सब राजस्व व्यय में आते हैं। अगर ये बहुत ज्यादा हों तो राजस्व घाटा बढ़ता है।

2. ब्याज भुगतान: पुराने कर्जों पर ब्याज देना पड़ता है। यह भी राजस्व व्यय है। अगर कर्ज ज्यादा है तो ब्याज भी ज्यादा, और राजस्व घाटा बढ़ता है।

3. कर संग्रह कम: अगर कर वसूली ठीक से नहीं हो रही, कर चोरी ज्यादा है, या आर्थिक मंदी है, तो राजस्व प्राप्तियां कम हो जाती हैं।

4. पेंशन और वेतन बढ़ोतरी: सरकारी कर्मचारियों की संख्या और उनके वेतन बढ़ते रहते हैं। वेतन आयोगों के बाद तो राजस्व व्यय में बड़ा उछाल आता है।

C) राजस्व घाटे का उदाहरण

मान लीजिए सरकार की एक साल में:

  • कर राजस्व: ₹15 लाख करोड़
  • गैर-कर राजस्व: ₹3 लाख करोड़
  • कुल राजस्व प्राप्तियां: ₹18 लाख करोड़
  • वेतन और पेंशन: ₹8 लाख करोड़
  • सब्सिडी: ₹5 लाख करोड़
  • ब्याज भुगतान: ₹7 लाख करोड़
  • अन्य राजस्व व्यय: ₹2 लाख करोड़
  • कुल राजस्व व्यय: ₹22 लाख करोड़

राजस्व घाटा = 22 - 18 = ₹4 लाख करोड़

मतलब सरकार को अपने रोजमर्रा के खर्चों को पूरा करने के लिए ₹4 लाख करोड़ उधार लेने पड़े। यह बहुत खतरनाक है क्योंकि इससे कोई संपत्ति नहीं बनी।


राजकोषीय घाटा क्या है - कुल उधारी का आंकड़ा

राजकोषीय घाटा सरकार का सबसे महत्वपूर्ण घाटा माना जाता है। यह बताता है कि सरकार को अपने कुल खर्चों को पूरा करने के लिए कितना उधार लेना पड़ रहा है।

सूत्र: राजकोषीय घाटा = कुल व्यय - (राजस्व प्राप्तियां + गैर-ऋण पूंजीगत प्राप्तियां)

या सरल भाषा में:

राजकोषीय घाटा = कुल व्यय - कुल प्राप्तियां (उधारी को छोड़कर)

1. राजकोषीय घाटे की विशेषताएं

  • कुल उधारी: यह बताता है कि सरकार एक साल में कितना उधार ले रही है। यह सरकार की कुल उधारी आवश्यकता है।
  • राजस्व + पूंजी दोनों: इसमें राजस्व और पूंजी दोनों तरह के खर्च शामिल हैं। यह समग्र राजकोषीय स्वास्थ्य का सूचक है।
  • सकल घरेलू उत्पाद के प्रतिशत में मापा जाता है: आमतौर पर राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद के प्रतिशत में बताया जाता है। जैसे "राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद का 3.5% है"।
  • मानक: राजकोषीय उत्तरदायित्व अधिनियम के तहत सरकार को राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद के 3% के अंदर रखना होता है।

2. राजकोषीय घाटे के कारण

  • राजस्व घाटा: अगर राजस्व घाटा है तो स्वतः राजकोषीय घाटा होगा।
  • पूंजीगत व्यय: सरकार अगर ज्यादा बुनियादी ढांचे में निवेश कर रही है (जो अच्छी बात है), तो भी राजकोषीय घाटा बढ़ेगा।
  • आर्थिक मंदी: जब अर्थव्यवस्था धीमी होती है तो कर संग्रह कम होता है, लेकिन व्यय कम नहीं होता। राजकोषीय घाटा बढ़ता है।
  • प्रति-चक्रीय उपाय: जब मंदी होती है तो सरकार जानबूझकर खर्च बढ़ाती है (प्रोत्साहन पैकेज) - राजकोषीय घाटा बढ़ता है लेकिन यह जरूरी होता है।

3. राजकोषीय घाटे का उदाहरण

पिछले उदाहरण को आगे बढ़ाते हैं:

  • कुल राजस्व प्राप्तियां: ₹18 लाख करोड़
  • गैर-ऋण पूंजीगत प्राप्तियां (विनिवेश, ऋण वसूली): ₹2 लाख करोड़
  • कुल गैर-ऋण प्राप्तियां: ₹20 लाख करोड़
  • कुल राजस्व व्यय: ₹22 लाख करोड़
  • पूंजीगत व्यय (सड़क, रेलवे, आदि): ₹8 लाख करोड़
  • कुल व्यय: ₹30 लाख करोड़

राजकोषीय घाटा = 30 - 20 = ₹10 लाख करोड़

अब देखिए - राजस्व घाटा था ₹4 लाख करोड़, लेकिन राजकोषीय घाटा है ₹10 लाख करोड़। बाकी ₹6 लाख करोड़ कहां गया? पूंजीगत व्यय में (₹8 लाख करोड़), जिसमें से ₹2 लाख करोड़ गैर-ऋण पूंजीगत प्राप्तियों से आए।


दोनों में मूलभूत अंतर

अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल - इन दोनों में फर्क क्या है?

तुलनात्मक विश्लेषण

परिभाषा:

  • राजस्व घाटा: राजस्व व्यय > राजस्व प्राप्तियां
  • राजकोषीय घाटा: कुल व्यय > कुल गैर-ऋण प्राप्तियां

दायरा:

  • राजस्व घाटा: सिर्फ राजस्व खातों को देखता है
  • राजकोषीय घाटा: राजस्व + पूंजी दोनों खातों को देखता है

संपत्ति निर्माण:

  • राजस्व घाटा: कोई संपत्ति नहीं बनती
  • राजकोषीय घाटा: संपत्ति बन सकती है (पूंजीगत व्यय के माध्यम से)

गंभीरता:

  • राजस्व घाटा: ज्यादा गंभीर (फिजूलखर्ची का सूचक)
  • राजकोषीय घाटा: कम गंभीर (अगर उत्पादक निवेश के लिए है)

संबंध:

  • राजस्व घाटा हमेशा राजकोषीय घाटे का हिस्सा होता है
  • राजकोषीय घाटा = राजस्व घाटा + (पूंजीगत व्यय - गैर-ऋण पूंजीगत प्राप्तियां)

लक्ष्य:

  • राजस्व घाटा: राजकोषीय उत्तरदायित्व अधिनियम में लक्ष्य है इसे शून्य करना
  • राजकोषीय घाटा: राजकोषीय उत्तरदायित्व अधिनियम में लक्ष्य है सकल घरेलू उत्पाद का 3%

मापन:

  • राजस्व घाटा: पूर्ण राशि या सकल घरेलू उत्पाद के प्रतिशत में
  • राजकोषीय घाटा: आमतौर पर सकल घरेलू उत्पाद के प्रतिशत में

प्राथमिक घाटा - तीसरा महत्वपूर्ण घाटा

एक और घाटा है जो समझना जरूरी है - प्राथमिक घाटा

प्राथमिक घाटा = राजकोषीय घाटा - ब्याज भुगतान

यह बताता है कि अगर हम ब्याज भुगतान को हटा दें (जो पुराने कर्जों का बोझ है), तो सरकार की वर्तमान राजकोषीय स्थिति क्या है।

अगर प्राथमिक घाटा शून्य या नकारात्मक है, तो इसका मतलब है कि सरकार सिर्फ पुराने कर्जों का ब्याज चुकाने के लिए नया कर्ज ले रही है। वर्तमान संचालन स्वनिर्भर हैं।


राजकोषीय उत्तरदायित्व अधिनियम और घाटों का लक्ष्यत्(FRBM Act 2003)

2003 में राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम पास हुआ। इसका उद्देश्य था सरकार पर राजकोषीय अनुशासन लागू करना।

राजकोषीय उत्तरदायित्व अधिनियम के मुख्य लक्ष्य

  • राजकोषीय घाटा: सकल घरेलू उत्पाद के 3% तक लाना (केंद्र सरकार के लिए)।
  • राजस्व घाटा: इसे समाप्त करना - यानी शून्य।
  • ऋण-सकल घरेलू उत्पाद अनुपात: इसे उचित स्तर पर रखना।

हालांकि, कई बार असाधारण परिस्थितियों में (जैसे कोविड-19 महामारी) इन लक्ष्यों को शिथिल किया जाता है। लेकिन दीर्घकालिक उद्देश्य यही रहता है।


दोनों घाटों का आर्थिक प्रभाव

A) राजस्व घाटे का प्रभाव

1. भविष्य पर बोझ: राजस्व घाटे से लिया गया कर्ज किसी संपत्ति में नहीं बदलता। यह सिर्फ उपभोग है। भविष्य की पीढ़ियों को इसका बोझ उठाना पड़ता है बिना किसी लाभ के।

2. भीड़ प्रभाव: सरकार जब ज्यादा उधार लेती है (वह भी अनुत्पादक उद्देश्यों के लिए), तो निजी क्षेत्र के लिए साख महंगी हो जाती है।

3. मुद्रास्फीति दबाव: अगर राजस्व घाटे को मुद्रीकृत किया जाए (यानी भारतीय रिजर्व बैंक से पैसे छापकर), तो मुद्रास्फीति बढ़ सकती है।

4. कम विकास: राजस्व घाटा उत्पादक निवेश नहीं है, इसलिए आर्थिक विकास में मदद नहीं करता।

B) राजकोषीय घाटे का प्रभाव

1. ऋण भार: राजकोषीय घाटा जितना ज्यादा, सार्वजनिक ऋण उतना ज्यादा। उच्च ऋण-सकल घरेलू उत्पाद अनुपात खतरनाक हो सकता है।

2. ब्याज भार: कर्ज बढ़ने से ब्याज भुगतान बढ़ता है, जो फिर राजस्व घाटा बढ़ाता है - एक दुष्चक्र।

3. सकारात्मक प्रभाव (अगर उत्पादक है): अगर राजकोषीय घाटा पूंजीगत व्यय के कारण है (सड़क, रेलवे, बंदरगाह), तो यह विकास को बढ़ावा दे सकता है।

4. विनिमय दर: उच्च राजकोषीय घाटा से चालू खाता घाटा बढ़ सकता है, जो रुपये को कमजोर कर सकता है।

5. साख निर्धारण: लगातार उच्च राजकोषीय घाटा से देश की साख निर्धारण गिर सकती है।


व्यावहारिक उदाहरण - कोविड-19 के दौरान

कोविड-19 महामारी ने दोनों घाटों को समझने का बेहतरीन उदाहरण दिया।

राजकोषीय घाटा बढ़ा: महामारी के दौरान सरकार ने प्रोत्साहन पैकेज दिए, स्वास्थ्य सेवा में खर्च किया, मुफ्त टीके दीं। राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद के 9% से ज्यादा चला गया।

राजस्व घाटा भी बढ़ा: तालाबंदी के कारण कर संग्रह गिरा, लेकिन व्यय बढ़ा (मुफ्त राशन, नकद हस्तांतरण)। राजस्व घाटा बढ़ा।

लेकिन यह जरूरी था: यह असाधारण स्थिति थी। अगर सरकार खर्च नहीं करती तो अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो सकती थी, लाखों लोग भूखे मर सकते थे।

धीरे-धीरे सामान्यीकरण: जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था सुधरी, सरकार ने फिर से राजकोषीय समेकन की तरफ बढ़ना शुरू किया।

इस उदाहरण से पता चलता है कि राजकोषीय लक्ष्य महत्वपूर्ण हैं, लेकिन कभी-कभी परिस्थितियों के हिसाब से लचीलापन भी जरूरी है।


अच्छा घाटा vs बुरा घाटा

सभी घाटे बुरे नहीं होते। यह निर्भर करता है कि पैसा कहां खर्च हो रहा है।

अच्छा घाटा

जब राजकोषीय घाटा पूंजीगत व्यय के कारण बढ़े और राजस्व घाटा कम या शून्य हो, तो यह "अच्छा घाटा" है। उदाहरण:

• सरकार ₹5 लाख करोड़ का राजकोषीय घाटा चला रही है • लेकिन राजस्व घाटा शून्य है • पूरा ₹5 लाख करोड़ बुनियादी ढांचे में जा रहा है • इससे संपत्तियां बन रही हैं, भविष्य में विकास होगा

बुरा घाटा

जब राजकोषीय घाटा में राजस्व घाटे का बड़ा हिस्सा हो, तो यह "बुरा घाटा" है। उदाहरण:

• राजकोषीय घाटा ₹5 लाख करोड़ • राजस्व घाटा ₹4 लाख करोड़ • पूंजीगत व्यय सिर्फ ₹1 लाख करोड़ • ज्यादातर पैसा उपभोग में जा रहा है

आदर्श स्थिति: राजस्व घाटा शून्य हो, राजकोषीय घाटा पूरी तरह पूंजीगत व्यय के लिए हो।


घाटों को कम कैसे करें

राजस्व घाटा कम करने के उपाय

कर संग्रह बढ़ाना: कर आधार बढ़ाना, चोरी रोकना, वस्तु एवं सेवा कर अनुपालन सुधारना।

गैर-कर राजस्व बढ़ाना: विनिवेश, स्पेक्ट्रम नीलामी, खनन पट्टों से राजस्व बढ़ाना।

सब्सिडी सुधार: लक्षित सब्सिडी - सिर्फ जरूरतमंदों को देना। प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण से रिसाव रोकना।

व्यय तर्कसंगतीकरण: अनावश्यक व्यय काटना, सरकारी योजनाओं की दक्षता बढ़ाना।

राजकोषीय घाटा कम करने के उपाय

राजस्व बढ़ाना: ऊपर बताए गए सभी उपाय।

पूंजीगत व्यय को दक्ष करना: परियोजनाओं को समय पर पूरा करना, लागत वृद्धि रोकना।

उधार लागत कम करना: घरेलू बचत जुटाना, बाहरी उधारी पर निर्भरता कम करना।

सकल घरेलू उत्पाद विकास बढ़ाना: अगर सकल घरेलू उत्पाद तेजी से बढ़ता है तो घाटा-सकल घरेलू उत्पाद अनुपात स्वतः कम होता है।


परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण बिंदु

• राजस्व घाटा = राजस्व व्यय - राजस्व प्राप्तियां

• राजकोषीय घाटा = कुल व्यय - कुल गैर-ऋण प्राप्तियां

• प्राथमिक घाटा = राजकोषीय घाटा - ब्याज भुगतान

• राजस्व घाटा हमेशा राजकोषीय घाटे का घटक होता है

• राजकोषीय उत्तरदायित्व अधिनियम (2003) के लक्ष्य: राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद का 3%, राजस्व घाटा शून्य

• राजस्व घाटा ज्यादा खतरनाक क्योंकि कोई संपत्ति नहीं बनती

• राजकोषीय घाटा अगर पूंजीगत व्यय के लिए है तो कम चिंताजनक

• प्रभावी राजस्व घाटा = राजस्व घाटा - पूंजीगत संपत्ति निर्माण के लिए अनुदान

• राजकोषीय घाटे को भारतीय रिजर्व बैंक से प्रत्यक्ष उधार (मुद्रीकरण) से पूरा नहीं किया जाता (यह 2006 से प्रतिबंधित है)

• राजकोषीय घाटे का मापन: बाजार उधार + बाहरी उधार + अन्य देयताएं


निष्कर्ष

    राजस्व घाटा और राजकोषीय घाटा दोनों सरकार के राजकोषीय स्वास्थ्य के महत्वपूर्ण सूचक हैं। लेकिन दोनों का मतलब अलग है।

राजस्व घाटा बताता है कि सरकार अपने रोजमर्रा के खर्चों के लिए भी उधार ले रही है। यह बहुत खतरनाक है क्योंकि इससे कोई संपत्ति नहीं बनती, सिर्फ कर्ज बढ़ता है। राजकोषीय उत्तरदायित्व अधिनियम का लक्ष्य है इसे शून्य करना।

राजकोषीय घाटा बताता है कि सरकार कुल कितना उधार ले रही है - राजस्व व्यय और पूंजीगत व्यय दोनों के लिए। यह अपने आप में बुरा नहीं - अगर यह उत्पादक निवेश के लिए है तो यह विकास को बढ़ावा दे सकता है।

एक स्वस्थ अर्थव्यवस्था में राजकोषीय घाटा होना सामान्य है (सकल घरेलू उत्पाद के 3% तक), लेकिन राजस्व घाटा शून्य होना चाहिए। इसका मतलब है कि सरकार सिर्फ संपत्ति निर्माण के लिए उधार ले रही है, न कि उपभोग के लिए।

कोविड जैसी असाधारण स्थितियों में लक्ष्यों से भटकना पड़ सकता है, लेकिन दीर्घकालिक में राजकोषीय अनुशासन जरूरी है। नहीं तो ऋण बढ़ता रहेगा, ब्याज भुगतान बढ़ते रहेंगे, और आने वाली पीढ़ियों पर बोझ पड़ेगा।


अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

प्रश्न 1: राजस्व घाटा और राजकोषीय घाटा में मुख्य अंतर क्या है?

उत्तर: राजस्व घाटा सिर्फ राजस्व खातों को देखता है - राजस्व व्यय और राजस्व प्राप्तियों का अंतर। राजकोषीय घाटा पूरे बजट को देखता है - कुल व्यय और कुल गैर-ऋण प्राप्तियों का अंतर। राजकोषीय घाटा बड़ा होता है क्योंकि इसमें पूंजीगत व्यय भी शामिल है। राजस्व घाटा ज्यादा खतरनाक माना जाता है क्योंकि इससे कोई संपत्ति नहीं बनती।

प्रश्न 2: क्या राजकोषीय घाटा हमेशा बुरा होता है?

उत्तर: नहीं, जरूरी नहीं। अगर राजकोषीय घाटा उत्पादक पूंजीगत व्यय (सड़क, बिजली, बंदरगाह) के कारण है और राजस्व घाटा शून्य है, तो यह अच्छा है। यह भविष्य में विकास में मदद करेगा। लेकिन अगर राजकोषीय घाटा में राजस्व घाटे का बड़ा हिस्सा है, तो यह चिंताजनक है। साथ ही, अगर राजकोषीय घाटा बहुत ज्यादा है (सकल घरेलू उत्पाद के 6-7% से ज्यादा) तो वह भी टिकाऊ नहीं है।

प्रश्न 3: प्राथमिक घाटा क्यों महत्वपूर्ण है?

उत्तर: प्राथमिक घाटा = राजकोषीय घाटा - ब्याज भुगतान। यह बताता है कि पुराने कर्जों के ब्याज को छोड़कर, सरकार की वर्तमान राजकोषीय स्थिति क्या है। अगर प्राथमिक घाटा शून्य है तो मतलब सरकार सिर्फ ब्याज भुगतान के लिए नया कर्ज ले रही है, वर्तमान संचालन के लिए नहीं। यह एक बेहतर सूचक है कि सरकार राजकोषीय समेकन की तरफ बढ़ रही है या नहीं।

प्रश्न 4: राजकोषीय उत्तरदायित्व अधिनियम क्या है और इसके लक्ष्य क्या हैं?

उत्तर: राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम 2003 में पास हुआ था। इसका उद्देश्य सरकार पर राजकोषीय अनुशासन लागू करना है। मुख्य लक्ष्य हैं: (1) राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद के 3% तक लाना, (2) राजस्व घाटे को समाप्त करना (शून्य), (3) ऋण-सकल घरेलू उत्पाद अनुपात को उचित स्तर पर रखना। हालांकि असाधारण परिस्थितियों में (जैसे कोविड) इन लक्ष्यों को अस्थायी रूप से शिथिल किया जा सकता है।

प्रश्न 5: राजस्व घाटा शून्य कैसे हो सकता है?

उत्तर: राजस्व घाटा शून्य करने के लिए: (1) कर संग्रह बढ़ाना - कर आधार विस्तार करना, चोरी रोकना, (2) गैर-कर राजस्व बढ़ाना - विनिवेश, स्पेक्ट्रम नीलामी, (3) सब्सिडियों को तर्कसंगत बनाना - लक्षित सब्सिडी, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण से रिसाव रोकना, (4) अनावश्यक राजस्व व्यय काटना - सरकारी योजनाओं की दक्षता बढ़ाना। अगर राजस्व प्राप्तियां = राजस्व व्यय हो जाए, तो राजस्व घाटा शून्य हो जाएगा।

प्रश्न 6: राजकोषीय घाटे को कैसे पूरा किया जाता है?

उत्तर: राजकोषीय घाटे को मुख्य रूप से: (1) बाजार उधार - सरकारी बांड जारी करके घरेलू बाजार से, (2) बाहरी उधार - विदेशी सरकारों या संस्थाओं से कर्ज, (3) छोटी बचतें (लोक भविष्य निधि, राष्ट्रीय बचत पत्र आदि), (4) भविष्य निधि से। भारतीय रिजर्व बैंक से प्रत्यक्ष मुद्रीकरण (पैसे छापना) 2006 से प्रतिबंधित है। बाजार उधार सबसे बड़ा स्रोत है।

प्रश्न 7: प्रभावी राजस्व घाटा क्या होता है?

उत्तर: प्रभावी राजस्व घाटा = राजस्व घाटा - पूंजीगत संपत्ति निर्माण के लिए अनुदान। कभी-कभी सरकार राजस्व खाते से राज्यों को अनुदान देती है जो पूंजीगत संपत्तियां बनाने के लिए होते हैं (जैसे स्कूल, अस्पताल)। तकनीकी रूप से यह राजस्व व्यय है लेकिन वास्तव में पूंजी निर्माण हो रहा है। प्रभावी राजस्व घाटा इसे समायोजित करता है और ज्यादा सटीक तस्वीर देता है।

प्रश्न 8: उच्च राजकोषीय घाटे से विनिमय दर पर क्या असर होता है?

उत्तर: उच्च राजकोषीय घाटा अक्सर चालू खाता घाटे को भी बढ़ाता है (जुड़वां घाटा समस्या)। इससे रुपये पर अवमूल्यन दबाव पड़ता है क्योंकि: (1) सरकार ज्यादा विदेशी मुद्रा उधार ले सकती है, (2) उच्च मुद्रास्फीति से निर्यात कम प्रतिस्पर्धी होते हैं, (3) विदेशी निवेशकों को राजकोषीय टिकाऊपन की चिंता होती है और वे पूंजी निकालते हैं। हालांकि यह स्वतः नहीं होता - दूसरे कारक भी मायने रखते हैं।

प्रश्न 9: कोविड-19 के दौरान राजकोषीय घाटा क्यों इतना बढ़ा?

उत्तर: कोविड के दौरान: (1) कर संग्रह गिरा (तालाबंदी, आर्थिक मंदी), (2) व्यय बढ़ा - मुफ्त राशन, नकद हस्तांतरण, स्वास्थ्य सेवा, टीके, प्रोत्साहन पैकेज, (3) यह असाधारण स्थिति थी जहां राजकोषीय विस्तार जरूरी था अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए। राजकोषीय उत्तरदायित्व अधिनियम लक्ष्य अस्थायी रूप से निलंबित किए गए। धीरे-धीरे जैसे अर्थव्यवस्था सुधरी, सरकार ने फिर राजकोषीय समेकन शुरू किया।

प्रश्न 10: क्या उच्च राजकोषीय घाटे से मुद्रास्फीति बढ़ती है?

उत्तर: जरूरी नहीं, लेकिन हो सकती है। अगर: (1) राजकोषीय घाटे को मुद्रीकृत किया जाए (भारतीय रिजर्व बैंक पैसे छापे) - तो मुद्रास्फीति बढ़ेगी। लेकिन यह अब प्रतिबंधित है। (2) घाटे के खर्च से समग्र मांग बहुत बढ़ जाए और आपूर्ति अनुसरण न करे - तो मांग-जनित मुद्रास्फीति हो सकती है। (3) सरकारी उधार से ब्याज दरें बढ़ें - तो लागत-जनित मुद्रास्फीति हो सकती है। लेकिन अगर घाटा उत्पादक निवेश में जा रहा है और अर्थव्यवस्था में अतिरिक्त क्षमता है, तो मुद्रास्फीति नहीं बढ़ेगी।

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