मौद्रिक नीति क्या है? रेपो रेट, CRR, SLR | पूरी जानकारी हिंदी में

 

मौद्रिक नीति: भारतीय अर्थव्यवस्था की धड़कन को नियंत्रित करने वाला अदृश्य हाथ

सुबह के अखबार में एक छोटी सी खबर छपी थी - "RBI ने रेपो रेट में 0.25% की बढ़ोतरी की"। मेरे पिताजी ने अखबार को मेज़ पर पटकते हुए कहा, "बस, अब हमारी होम लोन की EMI और बढ़ेगी।" उसी वक्त मेरी दादी माँ मुस्कुरा रही थीं, क्योंकि उनकी FD पर अब ज्यादा ब्याज मिलेगा।

एक ही फैसला, दो अलग प्रतिक्रियाएं। यही तो है मौद्रिक नीति का कमाल, जो देश के 140 करोड़ लोगों की जेब को सीधे प्रभावित करती है, लेकिन फिर भी ज्यादातर लोगों को इसके बारे में ठीक से पता नहीं होता।

आज मैं आपको मौद्रिक नीति की ऐसी यात्रा पर ले जाऊंगा जहां हर बात इतनी आसान और दिलचस्प होगी कि आप अंत तक पढ़ने से खुद को रोक नहीं पाएंगे। तो चलिए, शुरू करते हैं एक ऐसी कहानी से जो हम सबकी रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी है।


मौद्रिक नीति क्या है - एक दिलचस्प परिचय

कल्पना कीजिए कि पूरा देश एक विशाल गाड़ी है। इस गाड़ी में करोड़ों लोग बैठे हैं, लाखों कंपनियां काम कर रही हैं, और सब कुछ चल रहा है। अब इस गाड़ी को न तो बहुत तेज़ चलना चाहिए कि वो अनियंत्रित हो जाए, और न ही इतनी धीमी कि रुक ही जाए।

यहीं पर RBI यानी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ड्राइवर की भूमिका निभाता है, और मौद्रिक नीति उसका स्टीयरिंग व्हील है। जब गाड़ी बहुत तेज़ चलने लगती है यानी महंगाई बढ़ने लगती है, तो RBI ब्रेक लगाता है। जब गाड़ी बहुत धीमी हो जाती है यानी आर्थिक विकास रुकने लगता है, तो वो एक्सीलरेटर दबाता है।

असल में मौद्रिक नीति का मतलब है देश में पैसे की आपूर्ति और ब्याज दरों को नियंत्रित करना। जब बाजार में पैसा ज्यादा होता है तो चीजें महंगी हो जाती हैं, और जब कम होता है तो व्यापार सुस्त पड़ जाता है। RBI इस संतुलन को बनाए रखने के लिए कई तरह के औजारों का इस्तेमाल करता है, जिन्हें हम आगे विस्तार से समझेंगे। लेकिन पहले यह समझना जरूरी है कि यह सब क्यों जरूरी है।

मान लीजिए आपके मोहल्ले में सिर्फ एक ही ATM है। अगर उस ATM में हर दिन लाखों रुपये भरे जाएं और सब लोग पैसे निकाल लें, तो उनके पास इतना पैसा होगा कि वो जो चाहें खरीद सकें। लेकिन मोहल्ले की दुकानों में सामान तो सीमित है ना? तो क्या होगा? दुकानदार कीमतें बढ़ा देंगे क्योंकि उन्हें पता है कि लोगों के पास पैसा है। यही महंगाई है।

अब अगर ATM में पैसे ही नहीं भरे जाएं, तो लोग खरीदारी नहीं करेंगे, दुकानदार का व्यापार बंद हो जाएगा, उसे अपने कर्मचारियों की छुट्टी करनी पड़ेगी। यही मंदी है। RBI इन दोनों स्थितियों के बीच संतुलन बनाए रखता है।


मौद्रिक नीति के मुख्य उद्देश्य - क्यों जरूरी है यह सब

जब भी RBI कोई नीति बनाता है, तो उसके मन में चार मुख्य लक्ष्य होते हैं।

1. पहला और सबसे महत्वपूर्ण है कीमतों को स्थिर रखना। आपने देखा होगा कि कभी प्याज 100 रुपये किलो हो जाता है तो कभी 10 रुपये। यह अस्थिरता किसी के लिए अच्छी नहीं है। RBI की कोशिश रहती है कि महंगाई एक निश्चित दायरे में रहे, आजकल यह दायरा 4 प्रतिशत के आसपास रखा गया है, जिसमें 2 प्रतिशत ऊपर-नीचे हो सकता है।

2. दूसरा उद्देश्य है आर्थिक विकास को बढ़ावा देना। सोचिए अगर कारखानों को आसानी से कर्जा मिले तो वो नई मशीनें खरीदेंगे, ज्यादा उत्पादन करेंगे, और ज्यादा लोगों को नौकरी देंगे। लेकिन अगर कर्जा बहुत महंगा हो जाए तो कोई नया व्यापार शुरू ही नहीं करेगा। RBI इस बात का ध्यान रखता है कि कर्जा इतना महंगा न हो कि विकास रुक जाए, और इतना सस्ता भी न हो कि लोग फालतू खर्च करने लगें।

3. तीसरा महत्वपूर्ण काम है रोजगार के अवसर बढ़ाना। जब अर्थव्यवस्था अच्छी चलती है तो कंपनियां फैलती हैं, नए लोग भर्ती होते हैं। RBI अपनी नीतियों से यह सुनिश्चित करता है कि देश में नौकरियों की कमी न हो।

4. चौथा उद्देश्य है रुपये की कीमत को स्थिर रखना। अगर भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले बहुत कमजोर हो जाए तो विदेश से सामान मंगवाना महंगा पड़ेगा, और अगर बहुत मजबूत हो जाए तो हमारा निर्यात प्रभावित होगा। इन सभी चीजों का संतुलन बनाना RBI की जिम्मेदारी है।


मौद्रिक नीति के प्रकार - कसी और ढीली डोर

मौद्रिक नीति मुख्यतः दो तरह की होती है।

1. विस्तारवादी मौद्रिक नीति (Expansionary Monetary Policy)

पहली है विस्तारवादी मौद्रिक नीति, जिसे आसान भाषा में कहें तो यह बाजार में पैसे की आपूर्ति बढ़ाने वाली नीति है। जब अर्थव्यवस्था सुस्त पड़ जाती है, कंपनियां बंद होने लगती हैं, लोगों की नौकरियां जाने लगती हैं, तब RBI इस नीति को अपनाता है।

इसमें RBI ब्याज दरें कम कर देता है जिससे लोन लेना सस्ता हो जाता है। जब लोन सस्ता होता है तो लोग नया मकान खरीदते हैं, कार लेते हैं, व्यापारी अपना कारोबार बढ़ाते हैं। इससे पैसा बाजार में घूमने लगता है और अर्थव्यवस्था में जान आ जाती है।

2. संकुचनकारी मौद्रिक नीति (Contractionary Monetary Policy)

दूसरी है संकुचनकारी मौद्रिक नीति। यह विस्तारवादी नीति के बिल्कुल उल्टा है। जब महंगाई बहुत ज्यादा बढ़ जाती है, चीजों के दाम आसमान छूने लगते हैं, तब RBI इस नीति को अपनाता है। इसमें ब्याज दरें बढ़ा दी जाती हैं जिससे लोन लेना महंगा हो जाता है।

जब लोन महंगा होता है तो लोग कम खर्च करते हैं, कंपनियां नए निवेश से बचती हैं, और बाजार में पैसे की मात्रा कम हो जाती है। पैसा कम होने से मांग घटती है और कीमतें नीचे आने लगती हैं।

इन दोनों नीतियों का इस्तेमाल परिस्थिति के हिसाब से किया जाता है। जैसे 2008 में जब पूरी दुनिया में मंदी आई थी, तब भारत समेत सभी देशों ने विस्तारवादी नीति अपनाई थी ताकि अर्थव्यवस्था को गिरने से बचाया जा सके। वहीं जब 2013-14 में महंगाई बहुत बढ़ गई थी तब संकुचनकारी नीति अपनाई गई थी। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे सर्दियों में हम गरम कपड़े पहनते हैं और गर्मियों में हल्के। मौसम के हिसाब से कपड़े बदलने पड़ते हैं, वैसे ही आर्थिक स्थिति के अनुसार नीति बदलनी पड़ती है।


मौद्रिक नीति के औजार - RBI का हथियार भंडार

अब सवाल यह है कि RBI इन सब चीजों को करता कैसे है? इसके लिए उसके पास कई औजार हैं।

1. रेपो रेट (Repo Rate) - सबसे शक्तिशाली हथियार

सबसे प्रमुख औजार है रेपो रेट। यह वो दर है जिस पर RBI बैंकों को कर्जा देता है। मान लीजिए किसी बैंक के पास पैसे कम हो गए और उसे तुरंत पैसों की जरूरत है, तो वह RBI से कर्जा लेता है। अगर रेपो रेट 6 प्रतिशत है तो बैंक को RBI को 6 प्रतिशत ब्याज देना होगा। अब जब बैंक खुद RBI से महंगे दर पर कर्जा लेगा, तो वह आम लोगों को और भी महंगे दर पर कर्जा देगा। इस तरह से रेपो रेट बढ़ाकर या घटाकर RBI पूरे देश में कर्जे की कीमत को नियंत्रित करता है।

2. रिवर्स रेपो रेट (Reverse Repo Rate) - उल्टी चाल

दूसरा महत्वपूर्ण औजार है रिवर्स रेपो रेट। यह रेपो रेट का उल्टा है। इसमें बैंक अपना अतिरिक्त पैसा RBI के पास जमा करते हैं और बदले में ब्याज पाते हैं। अगर रिवर्स रेपो रेट ज्यादा है तो बैंक अपना पैसा लोगों को कर्जे में देने की बजाय RBI के पास रखना पसंद करेंगे क्योंकि वहां बिना किसी जोखिम के अच्छा ब्याज मिल रहा है। इससे बाजार में पैसे की आपूर्ति कम हो जाती है। RBI इन दोनों दरों में अंतर रखकर यह तय करता है कि बैंकों को कर्जा देने के लिए कितना प्रोत्साहित किया जाए।

3. कैश रिजर्व रेशियो (CRR) - आरक्षित निधि

तीसरा औजार है कैश रिजर्व रेशियो यानी CRR। इसके तहत हर बैंक को अपनी कुल जमा राशि का एक निश्चित हिस्सा RBI के पास नकद में रखना पड़ता है। मान लीजिए CRR 4 प्रतिशत है और किसी बैंक के पास लोगों की 100 करोड़ रुपये की जमा राशि है, तो उसे 4 करोड़ रुपये RBI के पास रखने पड़ेंगे। बाकी 96 करोड़ से ही वह लोन दे सकता है। अगर RBI CRR बढ़ाकर 5 प्रतिशत कर दे, तो बैंक के पास सिर्फ 95 करोड़ रुपये बचेंगे कर्जा देने के लिए। इस तरह CRR बढ़ाकर RBI बाजार में पैसे की आपूर्ति कम कर सकता है।

4. स्टैच्युटरी लिक्विडिटी रेशियो (SLR) - तरलता का प्रबंधन

चौथा औजार है स्टैच्युटरी लिक्विडिटी रेशियो यानी SLR। यह CRR से थोड़ा अलग है। इसमें बैंकों को अपनी जमा राशि का एक हिस्सा सरकारी बॉन्ड, सोना या नकदी में रखना पड़ता है। फर्क यह है कि CRR में रखे पैसे पर कोई ब्याज नहीं मिलता, लेकिन SLR में रखे सरकारी बॉन्ड पर ब्याज मिलता है। SLR की वर्तमान दर लगभग 18 प्रतिशत है। इसका मतलब है कि अगर किसी बैंक के पास 100 करोड़ की जमा राशि है तो उसे 18 करोड़ रुपये की सरकारी प्रतिभूतियां खरीदनी होंगी।

5. ओपन मार्केट ऑपरेशन (OMO) - खुले बाजार में खेल

पांचवां और बहुत ही रोचक औजार है ओपन मार्केट ऑपरेशन यानी OMO। इसमें RBI खुले बाजार में सरकारी बॉन्ड खरीदता या बेचता है। जब RBI बॉन्ड खरीदता है तो वह बाजार में पैसा छोड़ता है, और जब बेचता है तो पैसा वापस खींच लेता है। मान लीजिए RBI ने 1000 करोड़ के बॉन्ड खरीदे, तो इतना पैसा बाजार में आ गया। इससे बैंकों के पास ज्यादा पैसा हो गया जो वे कर्जे में दे सकते हैं। यह औजार बहुत लचीला है और RBI इसे जरूरत के अनुसार इस्तेमाल करता है।

अन्य महत्वपूर्ण औजार

छठा औजार है बैंक रेट, जो रेपो रेट से मिलता-जुलता है लेकिन इसमें बैंक लंबे समय के लिए RBI से कर्जा लेते हैं। आजकल रेपो रेट को ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है क्योंकि यह ज्यादा प्रभावी है। सातवां औजार है मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी यानी MSF, जो बैंकों के लिए आपातकालीन कर्जे की व्यवस्था है। यह रेपो रेट से थोड़ा महंगा होता है और तभी इस्तेमाल होता है जब बैंक को तुरंत पैसों की सख्त जरूरत होती है।


मौद्रिक नीति समिति - निर्णय लेने वाली टीम

2016 में भारत सरकार ने एक बहुत महत्वपूर्ण बदलाव किया। उससे पहले RBI का गवर्नर अकेले ही सारे निर्णय लेता था, लेकिन अब मौद्रिक नीति समिति यानी MPC बनाई गई है जिसमें छह सदस्य होते हैं। इनमें तीन सदस्य RBI के होते हैं जिनमें गवर्नर भी शामिल हैं, और तीन बाहरी विशेषज्ञ होते हैं जिन्हें सरकार चुनती है। यह समिति साल में कम से कम चार बार मिलती है और ब्याज दरों के बारे में फैसला करती है।

इस समिति का गठन इसलिए किया गया ताकि एक व्यक्ति पर निर्भरता कम हो और फैसले ज्यादा पारदर्शी हों। हर सदस्य की राय का वजन बराबर होता है और वोटिंग से फैसला लिया जाता है। अगर वोट बराबर हो जाएं तो गवर्नर का वोट निर्णायक होता है। समिति की हर बैठक के बाद एक विस्तृत बयान जारी किया जाता है जिसमें बताया जाता है कि किसने क्या वोट दिया और क्यों। यह पारदर्शिता बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे बाजार को पता चलता है कि RBI क्या सोच रहा है और आगे क्या करने वाला है।


मौद्रिक नीति का असर - आम आदमी पर प्रभाव

अब सवाल यह है कि यह सब हमारी जिंदगी को कैसे प्रभावित करता है।

1. होम लोन और EMI पर प्रभाव

मान लीजिए आपने होम लोन लिया है और आपकी EMI 25000 रुपये महीने की है। अगर RBI रेपो रेट में 0.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी कर दे, तो आपके बैंक की लागत बढ़ जाएगी और वह यह बढ़ी हुई लागत आप पर डाल देगा। नतीजा यह होगा कि आपकी EMI बढ़कर 25500 या 26000 रुपये हो सकती है। यह सीधे आपकी जेब पर असर डालता है। इसी तरह अगर आपने FD करवाई है तो ब्याज दरें बढ़ने से आपको ज्यादा रिटर्न मिलेगा, जो आपके लिए फायदेमंद है।

2. व्यापारियों पर प्रभाव

व्यापारियों पर भी इसका गहरा असर पड़ता है। एक छोटे व्यापारी की कल्पना कीजिए जो अपनी दुकान का विस्तार करना चाहता है। अगर ब्याज दरें कम हैं तो वह आसानी से 10 लाख रुपये का लोन लेकर नई दुकान खोल सकता है। लेकिन अगर दरें ज्यादा हैं तो वह सोचेगा कि इतना ब्याज चुकाना मुश्किल होगा और अपनी योजना टाल सकता है। इस तरह मौद्रिक नीति पूरे देश की आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित करती है।

3. शेयर बाजार पर असर

शेयर बाजार पर भी इसका सीधा असर होता है। जब ब्याज दरें कम होती हैं तो लोग FD में पैसा लगाने की बजाय शेयर बाजार में निवेश करते हैं क्योंकि वहां ज्यादा रिटर्न की उम्मीद होती है। इससे शेयर बाजार में तेजी आती है। उल्टा जब दरें बढ़ती हैं तो लोग शेयर बाजार से पैसा निकालकर FD में लगाना पसंद करते हैं क्योंकि वहां गारंटीड रिटर्न मिल रहा है।

4. रुपये की कीमत पर प्रभाव

रुपये की कीमत पर भी असर पड़ता है। अगर भारत में ब्याज दरें ज्यादा हैं तो विदेशी निवेशक यहां पैसा लगाना चाहेंगे, जिससे रुपये की मांग बढ़ेगी और वह मजबूत होगा।


मौद्रिक नीति बनाम राजकोषीय नीति - दो अलग रास्ते

कई बार लोग मौद्रिक नीति और राजकोषीय नीति में कन्फ्यूज हो जाते हैं। इन दोनों में बुनियादी फर्क यह है कि मौद्रिक नीति RBI बनाता है और राजकोषीय नीति सरकार बनाती है।

मौद्रिक नीति में पैसे की आपूर्ति और ब्याज दरों से खेला जाता है, जबकि राजकोषीय नीति में सरकार अपने खर्च और टैक्स से अर्थव्यवस्था को संभालती है। जैसे सरकार अगर ज्यादा सड़कें बनवाए, स्कूल खोले, या टैक्स घटाए तो यह राजकोषीय नीति है। लेकिन RBI अगर ब्याज दर घटाए या बढ़ाए तो यह मौद्रिक नीति है।

दोनों नीतियां अलग-अलग होती हैं लेकिन एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं। अगर सरकार बहुत ज्यादा खर्च कर रही है तो महंगाई बढ़ सकती है, और RBI को मजबूरन ब्याज दरें बढ़ानी पड़ सकती हैं। इसी तरह अगर RBI ने बहुत सख्त नीति अपनाई तो विकास रुक सकता है और सरकार को ज्यादा खर्च करना पड़ सकता है। आदर्श स्थिति तब होती है जब दोनों एक-दूसरे के साथ तालमेल बिठाकर काम करें। जैसे 2020 में कोरोना के समय सरकार ने लोगों को मुफ्त राशन दिया और RBI ने ब्याज दरें घटाईं, दोनों ने मिलकर अर्थव्यवस्था को संभाला।


भारत में मौद्रिक नीति का इतिहास - कैसे बदली व्यवस्था

1935 में जब RBI की स्थापना हुई तो उसका मुख्य काम भारतीय रुपये को स्थिर रखना था। उस समय भारत गुलाम था और अंग्रेज सरकार चलाती थी। आजादी के बाद 1949 में RBI को राष्ट्रीयकृत किया गया और इसे ज्यादा जिम्मेदारियां दी गईं।

1991 तक भारत में बंद अर्थव्यवस्था थी और सरकार का नियंत्रण सब जगह था। उस समय RBI की भूमिका सीमित थी। लेकिन 1991 में जब भारत ने आर्थिक सुधार शुरू किए तो RBI की भूमिका बढ़ गई।

2016 में सबसे बड़ा बदलाव आया जब मौद्रिक नीति समिति बनाई गई और महंगाई को नियंत्रित रखना RBI का प्राथमिक उद्देश्य घोषित किया गया। इससे पहले RBI को कई सारे उद्देश्य पूरे करने होते थे जिससे फोकस बंट जाता था। अब स्पष्ट है कि RBI को महंगाई को 4 प्रतिशत के आसपास रखना है। इस बदलाव के बाद भारत की मौद्रिक नीति दुनिया के विकसित देशों की तरह आधुनिक हो गई है। आज RBI की नीतियां पूरी दुनिया में सम्मान पाती हैं।


अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1. मौद्रिक नीति और राजकोषीय नीति में क्या अंतर है?

मौद्रिक नीति RBI द्वारा बनाई जाती है और इसमें ब्याज दरों तथा पैसे की आपूर्ति को नियंत्रित किया जाता है। राजकोषीय नीति सरकार द्वारा बनाई जाती है और इसमें सरकारी खर्च और टैक्स के जरिए अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया जाता है। दोनों अलग-अलग संस्थाओं द्वारा संचालित होती हैं लेकिन एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं।

2. रेपो रेट बढ़ने से आम आदमी पर क्या असर पड़ता है?

जब रेपो रेट बढ़ता है तो बैंकों की लागत बढ़ जाती है और वे आम लोगों को दिए जाने वाले लोन की ब्याज दरें भी बढ़ा देते हैं। इससे होम लोन, कार लोन, पर्सनल लोन सब महंगे हो जाते हैं। पहले से चल रहे लोन की EMI भी बढ़ सकती है अगर वह फ्लोटिंग रेट पर है। हालांकि FD और बचत खाते में ज्यादा ब्याज मिलने लगता है जो बचतकर्ताओं के लिए फायदेमंद होता है।

3. मौद्रिक नीति समिति में कितने सदस्य होते हैं और कैसे फैसले लिए जाते हैं?

मौद्रिक नीति समिति में कुल छह सदस्य होते हैं। तीन सदस्य RBI के होते हैं जिनमें गवर्नर, डिप्टी गवर्नर और एक अधिकारी शामिल होते हैं। बाकी तीन बाहरी विशेषज्ञ होते हैं जिन्हें सरकार चुनती है। फैसले वोटिंग से लिए जाते हैं और अगर वोट बराबर हो जाएं तो गवर्नर का वोट निर्णायक होता है। समिति साल में कम से कम चार बार मिलती है।

4. CRR और SLR में क्या अंतर है?

CRR यानी कैश रिजर्व रेशियो में बैंकों को अपनी जमा राशि का एक हिस्सा RBI के पास नकद में रखना पड़ता है और इस पर कोई ब्याज नहीं मिलता। SLR यानी स्टैच्युटरी लिक्विडिटी रेशियो में बैंकों को अपनी जमा राशि का एक हिस्सा सरकारी बॉन्ड, सोना या नकदी में रखना पड़ता है और इस पर ब्याज मिलता है। दोनों का उद्देश्य बैंकों की तरलता को नियंत्रित करना है लेकिन तरीका अलग है।

5. भारत में मुद्रास्फीति का लक्ष्य क्या है?

वर्तमान में भारत में मुद्रास्फीति का लक्ष्य 4 प्रतिशत रखा गया है जिसमें ऊपर-नीचे 2 प्रतिशत की छूट है। मतलब मुद्रास्फीति 2 प्रतिशत से 6 प्रतिशत के बीच रहनी चाहिए। अगर लगातार तीन तिमाहियों तक मुद्रास्फीति इस दायरे से बाहर रहती है तो RBI को सरकार को लिखित में स्पष्टीकरण देना पड़ता है। यह व्यवस्था 2016 में शुरू की गई थी।

6. मौद्रिक नीति से शेयर बाजार कैसे प्रभावित होता है?

जब RBI ब्याज दरें घटाता है तो बैंकों में रखे पैसे पर कम रिटर्न मिलता है। इसलिए लोग अपना पैसा FD से निकालकर शेयर बाजार में लगाते हैं जहां ज्यादा रिटर्न की उम्मीद होती है। इससे शेयर बाजार में तेजी आती है। उल्टा जब ब्याज दरें बढ़ती हैं तो लोग शेयर बाजार से पैसा निकालकर सुरक्षित FD में लगाना पसंद करते हैं, जिससे बाजार में गिरावट आ सकती है।

7. विस्तारवादी और संकुचनकारी मौद्रिक नीति कब अपनाई जाती है?

विस्तारवादी मौद्रिक नीति तब अपनाई जाती है जब अर्थव्यवस्था में मंदी हो, विकास दर कम हो, और बेरोजगारी बढ़ रही हो। इसमें ब्याज दरें घटाई जाती हैं ताकि लोग ज्यादा खर्च करें और अर्थव्यवस्था में रफ्तार आए। संकुचनकारी नीति तब अपनाई जाती है जब महंगाई बहुत ज्यादा बढ़ जाए। इसमें ब्याज दरें बढ़ाई जाती हैं ताकि लोग कम खर्च करें और कीमतें नियंत्रित हों।

8. ओपन मार्केट ऑपरेशन क्या है?

ओपन मार्केट ऑपरेशन में RBI खुले बाजार में सरकारी बॉन्ड और प्रतिभूतियां खरीदता या बेचता है। जब RBI बॉन्ड खरीदता है तो वह बाजार में पैसा छोड़ता है क्योंकि वह बैंकों को भुगतान करता है। इससे बैंकों के पास ज्यादा पैसा हो जाता है जो वे कर्जे में दे सकते हैं। जब RBI बॉन्ड बेचता है तो बाजार से पैसा वापस खींचता है। यह बहुत लचीला औजार है जिसे जरूरत के अनुसार इस्तेमाल किया जा सकता है।


इस तरह मौद्रिक नीति भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है जो चुपचाप लेकिन प्रभावी ढंग से देश की आर्थिक सेहत को बनाए रखती है। आज जब आप अखबार में रेपो रेट की खबर पढ़ें तो आप समझ सकेंगे कि यह आपकी जिंदगी को कैसे छूने वाला है। यह नीति न सिर्फ बड़े उद्योगपतियों और अर्थशास्त्रियों के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए है जो रोज़ बाजार जाता है, लोन लेता है, या अपनी मेहनत की कमाई बचाता है।

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