राजकोषीय नीति क्या है, Fiscal Policy in Hindi, राजकोषीय घाटा, सरकारी बजट, विस्तारवादी राजकोषीय नीति, राजस्व घाटा, राजकोषीय और मौद्रिक नीति में अंतर।

 

राजकोषीय नीति क्या है? Fiscal Policy की सम्पूर्ण जानकारी हिंदी में।

    फरवरी का महीना था। टीवी पर वित्त मंत्री बजट पेश कर रही थीं। मेरे पड़ोसी काका जी खुश होकर बोले, "वाह! इनकम टैक्स की छूट बढ़ा दी, अब हाथ में ज्यादा पैसा बचेगा।" उसी समय मेरे दोस्त का फोन आया, "यार, पेट्रोल पर टैक्स और बढ़ा दिया, अब गाड़ी चलाना और मुश्किल हो जाएगा।"

एक ही बजट, अलग-अलग प्रतिक्रियाएं। कोई खुश, कोई नाराज। यही तो है राजकोषीय नीति का खेल, जहां सरकार अपने खर्च और आय के जरिए पूरे देश की अर्थव्यवस्था को दिशा देती है। आज मैं आपको राजकोषीय नीति की ऐसी यात्रा पर ले चलूंगा जहां हर बात इतनी रोचक होगी कि आप पढ़ते ही चले जाएंगे।


राजकोषीय नीति क्या है - एक दिलचस्प परिचय

कल्पना कीजिए कि आपके घर का बजट आपके पिताजी संभालते हैं। महीने की शुरुआत में वो तय करते हैं कि कितना पैसा कहां खर्च करना है। बच्चों की फीस पर कितना, राशन पर कितना, बिजली बिल पर कितना। अगर महीने के अंत में पैसा बच जाए तो बचत, और अगर कम पड़ जाए तो कर्ज लेना पड़ता है। बिल्कुल यही काम सरकार करती है, लेकिन पूरे देश के लिए। इसी को राजकोषीय नीति कहते हैं।

असल में राजकोषीय नीति का मतलब है सरकार अपने खर्च और आय के जरिए अर्थव्यवस्था को कैसे नियंत्रित करती है। जब सरकार सड़कें बनाती है, स्कूल खोलती है, सेना के लिए खर्च करती है, गरीबों को सब्सिडी देती है तो यह सब राजकोषीय नीति का हिस्सा है। दूसरी तरफ जब वो आपसे इनकम टैक्स लेती है, पेट्रोल पर ड्यूटी वसूलती है, या जीएसटी जमा करती है तो यह भी राजकोषीय नीति है।

मान लीजिए आपके शहर में बेरोजगारी बहुत बढ़ गई है। लोगों के पास काम नहीं है, दुकानों में ग्राहक नहीं आ रहे, सब कुछ सुस्त पड़ा है। अब सरकार क्या कर सकती है? वो एक नया हाईवे बनाने का ऐलान कर देती है। तुरंत हजारों मजदूरों को काम मिल जाएगा, सीमेंट-लोहे की फैक्ट्रियों में उत्पादन बढ़ेगा, ट्रक ड्राइवरों को काम मिलेगा। धीरे-धीरे पूरी अर्थव्यवस्था में रफ्तार आने लगेगी। यही तो है राजकोषीय नीति की ताकत।

अब दूसरी स्थिति सोचिए। बाजार में इतना पैसा घूम रहा है कि लोग जमकर खर्च कर रहे हैं। इससे महंगाई बेकाबू हो रही है। प्याज 100 रुपये किलो हो गया है। अब सरकार टैक्स बढ़ा देती है। लोगों की जेब में पैसा कम होगा तो वो कम खर्च करेंगे। मांग घटेगी तो दाम नियंत्रित होंगे। यह भी राजकोषीय नीति है।


राजकोषीय नीति के मुख्य उद्देश्य - सरकार क्यों करती है यह सब

1. जब सरकार अपना बजट बनाती है तो उसके मन में कई लक्ष्य होते हैं। सबसे पहला और महत्वपूर्ण है आर्थिक विकास को बढ़ावा देना। देश की जीडीपी बढ़नी चाहिए, कारखाने चलने चाहिए, नए उद्योग लगने चाहिए। इसके लिए सरकार बुनियादी ढांचे पर खर्च करती है। नई सड़कें बनती हैं तो माल ढुलाई आसान होती है, नए रेलवे ट्रैक बिछते हैं तो यात्रा सस्ती होती है, नए हवाई अड्डे बनते हैं तो व्यापार फैलता है।

2. दूसरा बड़ा उद्देश्य है रोजगार के अवसर बढ़ाना। जब सरकार बड़े प्रोजेक्ट शुरू करती है तो लाखों लोगों को काम मिलता है। मनरेगा जैसी योजनाएं इसी का उदाहरण हैं जहां गांवों में लोगों को काम दिया जाता है। नरेगा में एक मजदूर को 100 दिन का रोजगार गारंटी के साथ मिलता है। उसे तालाब खोदने का काम मिलता है, सड़क बनाने का काम मिलता है। इससे उसकी आमदनी होती है और वो अपने परिवार का पेट पाल सकता है।

3. तीसरा महत्वपूर्ण लक्ष्य है आय की असमानता कम करना। देश में कुछ लोग बहुत अमीर हैं और ज्यादातर लोग गरीब। सरकार अमीरों पर ज्यादा टैक्स लगाती है और उस पैसे से गरीबों के लिए योजनाएं चलाती है। मुफ्त राशन, मुफ्त इलाज, मुफ्त शिक्षा जैसी योजनाएं इसी का हिस्सा हैं। एक करोड़पति पर 30 प्रतिशत टैक्स लगता है जबकि एक गरीब आदमी को टैक्स ही नहीं देना पड़ता। यह धन का पुनर्वितरण कहलाता है।

4. चौथा उद्देश्य है महंगाई को नियंत्रित करना। अगर बाजार में पैसा बहुत ज्यादा हो जाए तो कीमतें बढ़ने लगती हैं। सरकार टैक्स बढ़ाकर या अपना खर्च घटाकर इसे नियंत्रित कर सकती है। पांचवां लक्ष्य है विदेशी निवेश को आकर्षित करना। जब सरकार अच्छी सड़कें बनाती है, बिजली की व्यवस्था दुरुस्त करती है तो विदेशी कंपनियां भारत में आकर निवेश करना चाहती हैं।


राजकोषीय नीति के प्रकार - कब कौन सी नीति

राजकोषीय नीति मुख्य रूप से दो तरह की होती है और इन्हें समझना बहुत आसान है।

1. विस्तारवादी राजकोषीय नीति - एक्सीलरेटर दबाना

जब अर्थव्यवस्था सुस्त पड़ जाती है, कंपनियां बंद होने लगती हैं, लोगों की नौकरियां जाने लगती हैं, तब सरकार विस्तारवादी नीति अपनाती है। इसमें सरकार अपना खर्च बढ़ा देती है या टैक्स घटा देती है, या दोनों करती है। मान लीजिए 2008 में जब पूरी दुनिया में मंदी आई थी, तब भारत सरकार ने क्या किया? उसने बड़े पैमाने पर सड़क निर्माण शुरू किया, ग्रामीण रोजगार योजनाएं बढ़ाईं, और कुछ टैक्स में राहत दी।

    इसका नतीजा क्या हुआ? सड़क बनाने के लिए हजारों मजदूरों को काम मिला। उन्हें मजदूरी मिली तो उन्होंने बाजार से सामान खरीदा। दुकानदारों का व्यापार चला। दुकानदारों ने थोक विक्रेताओं से सामान खरीदा। विक्रेताओं ने कारखानों से आर्डर दिए। कारखानों में उत्पादन बढ़ा तो और मजदूरों को नौकरी मिली। यह एक चक्र बन गया जिसे गुणक प्रभाव या मल्टीप्लायर इफेक्ट कहते हैं। सरकार ने 100 करोड़ खर्च किए लेकिन उसका असर 300-400 करोड़ का हुआ।

विस्तारवादी नीति का दूसरा तरीका है टैक्स घटाना। मान लीजिए सरकार ने इनकम टैक्स की स्लैब बढ़ा दी। पहले 5 लाख तक टैक्स फ्री था, अब 7 लाख तक कर दिया। इससे लोगों के हाथ में ज्यादा पैसा बचेगा। वो उस पैसे से नई कार खरीदेंगे, घर का सामान लेंगे, बच्चों की पढ़ाई पर खर्च करेंगे। इससे बाजार में मांग बढ़ेगी और अर्थव्यवस्था में रफ्तार आएगी।

2. संकुचनकारी राजकोषीय नीति - ब्रेक लगाना

अब उल्टी स्थिति सोचिए। अर्थव्यवस्था बहुत तेजी से बढ़ रही है, लोगों के पास ढेर सारा पैसा है, सब जमकर खर्च कर रहे हैं। इससे महंगाई बहुत बढ़ गई है। प्याज 150 रुपये किलो हो गया, टमाटर 100 रुपये, पेट्रोल 120 रुपये लीटर। आम आदमी की हालत खराब हो गई। अब सरकार संकुचनकारी नीति अपनाती है।

इसमें या तो सरकार अपना खर्च कम कर देती है या फिर टैक्स बढ़ा देती है। जब टैक्स बढ़ता है तो लोगों की जेब में पैसा कम होता है। कम पैसा मतलब कम खरीदारी। कम खरीदारी मतलब कम मांग। कम मांग मतलब दाम घटने लगेंगे। उदाहरण के लिए अगर सरकार पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी बढ़ा दे तो पेट्रोल महंगा हो जाएगा। लोग कम गाड़ी चलाएंगे, डीजल की मांग घटेगी। मांग घटेगी तो कीमत नियंत्रित होगी।

दूसरा तरीका है सरकारी खर्च कम करना। मान लीजिए सरकार ने तय किया कि इस साल नई योजनाएं शुरू नहीं करेंगे, सिर्फ जरूरी खर्च करेंगे। इससे बाजार में पैसे की आपूर्ति कम होगी और महंगाई काबू में आएगी। लेकिन यह नीति बहुत सावधानी से अपनानी पड़ती है क्योंकि अगर ज्यादा कस दिया तो अर्थव्यवस्था की रफ्तार ही रुक सकती है।


राजकोषीय नीति के औजार - सरकार के हथियार

सरकार के पास राजकोषीय नीति चलाने के लिए मुख्य रूप से दो बड़े औजार हैं।

1. सरकारी खर्च - पहला शक्तिशाली औजार

सरकार जितना पैसा खर्च करती है उसे सार्वजनिक व्यय कहते हैं। यह खर्च कई तरह का होता है। पहला है विकास व्यय जिसमें सड़क, पुल, रेलवे, बिजली जैसे बुनियादी ढांचे पर खर्च होता है। जब दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे बनता है तो हजारों करोड़ रुपये खर्च होते हैं। इससे न सिर्फ लोगों को काम मिलता है बल्कि भविष्य में व्यापार भी आसान होगा।

दूसरा है गैर-विकास व्यय जिसमें सरकारी कर्मचारियों की तनख्वाह, पेंशन, सब्सिडी आदि आते हैं। जब सरकार किसानों को खाद पर सब्सिडी देती है तो यह गैर-विकास व्यय है। तीसरा है रक्षा व्यय जिसमें सेना के लिए हथियार, जवानों की तनख्वाह, सीमा सुरक्षा का खर्च आता है। भारत की सीमा पाकिस्तान और चीन से लगती है इसलिए हमें मजबूत सेना रखनी पड़ती है।

चौथा है सामाजिक क्षेत्र का खर्च। मुफ्त शिक्षा, मुफ्त इलाज, पीएम आवास योजना, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ जैसी योजनाओं पर पैसा खर्च होता है। जब सरकार हर गरीब को मुफ्त राशन देती है तो करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। यह खर्च सीधे गरीबों की मदद करता है और उनकी क्रय शक्ति बढ़ाता है।

2. कर और राजस्व - दूसरा महत्वपूर्ण औजार

सरकार को पैसा कहां से आता है? मुख्य रूप से टैक्स से। टैक्स दो तरह के होते हैं। पहला है प्रत्यक्ष कर जो सीधे आपकी आय या संपत्ति पर लगता है। इनकम टैक्स इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। अगर आपकी सालाना आय 10 लाख है तो आपको लगभग 1 लाख रुपये टैक्स देना पड़ेगा। कॉर्पोरेट टैक्स भी प्रत्यक्ष कर है जो कंपनियों के मुनाफे पर लगता है। प्रॉपर्टी टैक्स, वेल्थ टैक्स भी इसी श्रेणी में आते हैं।

दूसरा है अप्रत्यक्ष कर जो चीजों की खरीद-फरोख्त पर लगता है। जीएसटी आजकल का सबसे बड़ा अप्रत्यक्ष कर है। जब आप दुकान से कोई सामान खरीदते हैं तो उसमें 5%, 12%, 18% या 28% जीएसटी जुड़ा होता है। पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी लगती है। आयातित सामान पर कस्टम ड्यूटी लगती है। सिगरेट-शराब पर भारी टैक्स लगता है क्योंकि सरकार इनके इस्तेमाल को हतोत्साहित करना चाहती है।

टैक्स के अलावा सरकार की कुछ गैर-कर आय भी होती है। सरकारी कंपनियों से मिलने वाला लाभांश, स्पेक्ट्रम की नीलामी से मिला पैसा, सरकारी जमीन बेचने से मिला पैसा, ये सब गैर-कर आय हैं। जब सरकार एयर इंडिया को टाटा को बेचती है तो उसे हजारों करोड़ मिलते हैं।


राजकोषीय घाटे के प्रकार - कितनी तरह की कमी

जब सरकार का खर्च उसकी आय से ज्यादा हो जाता है तो घाटा होता है। यह घाटा कई तरह का होता है और हर एक का अलग मतलब है।

1. राजस्व घाटा - चिंता की बात

यह सबसे खतरनाक घाटा है। जब सरकार की नियमित आय उसके नियमित खर्च से कम हो जाए तो राजस्व घाटा होता है। मान लीजिए सरकार को टैक्स से 20 लाख करोड़ मिले और उसका नियमित खर्च 22 लाख करोड़ हो तो 2 लाख करोड़ का राजस्व घाटा हुआ। यह इसलिए खतरनाक है क्योंकि इसका मतलब है सरकार अपने रोजमर्रा के खर्च के लिए भी कर्ज ले रही है। यह ऐसा है जैसे आप अपनी महीने की किराने की खरीदारी के लिए क्रेडिट कार्ड से कर्ज लें। यह टिकाऊ नहीं है।

2. राजकोषीय घाटा - असली तस्वीर

यह सबसे महत्वपूर्ण घाटा है जिसे हर कोई देखता है। यह सरकार के कुल खर्च और कुल आय में अंतर है। मान लीजिए सरकार का कुल खर्च 40 लाख करोड़ है और कुल आय 35 लाख करोड़ तो राजकोषीय घाटा 5 लाख करोड़ हुआ। इसे जीडीपी के प्रतिशत में मापा जाता है। आदर्श स्थिति यह है कि राजकोषीय घाटा जीडीपी के 3 प्रतिशत से कम रहे। अगर यह बहुत ज्यादा बढ़ जाए तो सरकार को कर्ज लेना पड़ता है और ब्याज का बोझ बढ़ता जाता है।

3. प्राथमिक घाटा - मूल समस्या

यह राजकोषीय घाटे में से ब्याज के भुगतान को हटाने पर मिलता है। मान लीजिए राजकोषीय घाटा 5 लाख करोड़ है और सरकार पुराने कर्जों पर 2 लाख करोड़ ब्याज दे रही है, तो प्राथमिक घाटा 3 लाख करोड़ होगा। यह बताता है कि सरकार की असली समस्या कितनी बड़ी है। अगर प्राथमिक घाटा शून्य है मतलब सरकार केवल पुराने ब्याज की वजह से कर्ज ले रही है, नए खर्चों के लिए नहीं।


राजकोषीय नीति बनाम मौद्रिक नीति - दो अलग दुनिया

बहुत लोग राजकोषीय नीति और मौद्रिक नीति को एक समझ लेते हैं लेकिन ये दोनों बिल्कुल अलग हैं। राजकोषीय नीति सरकार बनाती है और वित्त मंत्रालय संभालता है। इसमें सरकारी खर्च और टैक्स के जरिए अर्थव्यवस्था को नियंत्रित किया जाता है। जब सरकार बजट में ऐलान करती है कि इस साल नई मेट्रो लाइन बनाएंगे या इनकम टैक्स घटाएंगे तो यह राजकोषीय नीति है।

दूसरी तरफ मौद्रिक नीति आरबीआई यानी रिजर्व बैंक बनाता है। इसमें ब्याज दरों और पैसे की आपूर्ति से खेला जाता है। जब आरबीआई रेपो रेट बढ़ाता या घटाता है तो यह मौद्रिक नीति है। दोनों का उद्देश्य एक ही है - अर्थव्यवस्था को सही रास्ते पर रखना, लेकिन तरीका अलग है।

कभी-कभी दोनों एक दूसरे के खिलाफ भी काम कर सकती हैं। मान लीजिए सरकार अर्थव्यवस्था को बूस्ट करने के लिए बहुत खर्च कर रही है लेकिन आरबीआई को लग रहा है कि महंगाई बढ़ रही है तो वो ब्याज दरें बढ़ा देगा। अब एक तरफ सरकार एक्सीलरेटर दबा रही है और दूसरी तरफ आरबीआई ब्रेक लगा रहा है। आदर्श स्थिति तब होती है जब दोनों तालमेल से काम करें।


राजकोषीय नीति का प्रभाव - किस पर कितना असर

राजकोषीय नीति का सीधा असर हर किसी की जिंदगी पर पड़ता है। जब सरकार बजट में इनकम टैक्स स्लैब बढ़ाती है तो मध्यम वर्ग के लोगों की जेब में ज्यादा पैसा बचता है। एक सैलरीड व्यक्ति जो पहले 50,000 रुपये टैक्स दे रहा था, अब 30,000 ही देगा। बचे हुए 20,000 रुपये से वो अपने बच्चों की अच्छी पढ़ाई करवा सकता है या घर का कोई जरूरी सामान खरीद सकता है।

किसानों पर भी राजकोषीय नीति का गहरा असर पड़ता है। जब सरकार खाद पर सब्सिडी देती है तो एक किसान को यूरिया का बैग 300 रुपये में मिल जाता है जबकि उसकी असली कीमत 3000 रुपये है। बाकी 2700 रुपये सरकार अपनी जेब से देती है। इसी तरह बिजली पर सब्सिडी, फसल बीमा योजना, न्यूनतम समर्थन मूल्य, ये सब राजकोषीय नीति के औजार हैं।

गरीबों पर सबसे ज्यादा असर पड़ता है। मुफ्त राशन योजना में 80 करोड़ लोगों को हर महीने मुफ्त अनाज मिलता है। एक गरीब परिवार को 5 किलो गेहूं और 5 किलो चावल मुफ्त में मिलता है। इसका मतलब है उनके 500-600 रुपये महीने की बचत। यह पैसा वो अपने बच्चों की पढ़ाई या दवाई पर खर्च कर सकते हैं।

व्यापारियों पर भी राजकोषीय नीति का सीधा असर होता है। जब सरकार कॉर्पोरेट टैक्स घटाती है तो कंपनियों के पास ज्यादा पैसा बचता है। यह पैसा वो नई मशीनें खरीदने में लगा सकती हैं, नए कर्मचारी रख सकती हैं, या रिसर्च में निवेश कर सकती हैं। 2019 में जब सरकार ने कॉर्पोरेट टैक्स 30 प्रतिशत से घटाकर 22 प्रतिशत कर दिया तो विदेशी निवेशकों में उत्साह बढ़ा।


भारत में राजकोषीय नीति का इतिहास - कैसे बदली व्यवस्था

आजादी के बाद भारत ने मिश्रित अर्थव्यवस्था का मॉडल अपनाया। इसमें सरकार और निजी क्षेत्र दोनों की भूमिका थी। 1950 और 1960 के दशक में सरकार ने भारी उद्योग पर बहुत खर्च किया। टाटा स्टील, भिलाई स्टील प्लांट, भाखड़ा नांगल बांध जैसे बड़े प्रोजेक्ट शुरू हुए। उस समय राजकोषीय नीति का मुख्य फोकस औद्योगीकरण था।

1970 और 1980 के दशक में सरकार ने गरीबी हटाओ का नारा दिया। सब्सिडी बढ़ाई गईं, सरकारी नौकरियां बढ़ीं, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम खोले गए। लेकिन इसका नतीजा यह हुआ कि राजकोषीय घाटा बहुत बढ़ गया। सरकार का खर्च आय से बहुत ज्यादा हो गया। 1991 तक स्थिति इतनी खराब हो गई कि देश दिवालिया होने के कगार पर पहुंच गया।

1991 में भारत ने आर्थिक सुधार शुरू किए। राजकोषीय जिम्मेदारी पर जोर दिया गया। 2003 में राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम यानी FRBM Act बनाया गया। इसमें तय किया गया कि राजकोषीय घाटा जीडीपी के 3 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होना चाहिए। लेकिन 2020 में कोरोना महामारी आई तो सरकार को इस नियम को तोड़ना पड़ा। लोगों को बचाना ज्यादा जरूरी था।


अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1. राजकोषीय नीति और मौद्रिक नीति में क्या मुख्य अंतर है?

राजकोषीय नीति सरकार बनाती है और इसमें सरकारी खर्च तथा टैक्स के जरिए अर्थव्यवस्था को नियंत्रित किया जाता है। मौद्रिक नीति RBI बनाता है और इसमें ब्याज दरों एवं पैसे की आपूर्ति से अर्थव्यवस्था को संभाला जाता है। राजकोषीय नीति में बजट का इस्तेमाल होता है जबकि मौद्रिक नीति में रेपो रेट जैसे औजारों का।

2. राजकोषीय घाटा क्यों खतरनाक होता है?

जब राजकोषीय घाटा बहुत ज्यादा बढ़ जाता है तो सरकार को भारी कर्ज लेना पड़ता है। इस कर्ज पर ब्याज चुकाना पड़ता है। ब्याज का बोझ इतना बढ़ जाता है कि सरकार के पास विकास कार्यों के लिए पैसा ही नहीं बचता। साथ ही बहुत ज्यादा कर्ज लेने से देश की साख गिरती है और विदेशी निवेशक डरने लगते हैं।

3. विस्तारवादी राजकोषीय नीति कब अपनाई जाती है?

जब अर्थव्यवस्था में मंदी हो, बेरोजगारी बढ़ रही हो, कंपनियां बंद हो रही हों और विकास दर गिर रही हो तब विस्तारवादी नीति अपनाई जाती है। इसमें सरकार अपना खर्च बढ़ाती है या टैक्स घटाती है ताकि लोगों के हाथ में पैसा आए और वो खर्च करें। 2008 की मंदी और 2020 के कोरोना काल में यही नीति अपनाई गई थी।

4. राजस्व घाटा और राजकोषीय घाटे में क्या अंतर है?

राजस्व घाटा तब होता है जब सरकार की नियमित आय उसके नियमित खर्च से कम हो। यह ज्यादा चिंताजनक है क्योंकि इसका मतलब है सरकार रोजमर्रा के खर्च के लिए भी कर्ज ले रही है। राजकोषीय घाटा सरकार के कुल खर्च और कुल आय में अंतर है। इसमें विकास व्यय भी शामिल है जो भविष्य में फायदेमंद होता है।

5. सरकार राजकोषीय घाटे को कैसे पूरा करती है?

सरकार राजकोषीय घाटे को पूरा करने के लिए बॉन्ड जारी करती है। ये बॉन्ड बैंक, बीमा कंपनियां, म्यूचुअल फंड और आम लोग खरीदते हैं। सरकार उन्हें एक निश्चित अवधि के बाद ब्याज सहित पैसा लौटाती है। कभी-कभी सरकार अपनी संपत्ति जैसे एयर इंडिया या BSNL को बेचकर भी पैसा जुटाती है, इसे विनिवेश कहते हैं।

6. प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर में क्या फर्क है?

प्रत्यक्ष कर वो होता है जो सीधे आपकी आय या संपत्ति पर लगता है और आप इसे किसी और पर नहीं डाल सकते। इनकम टैक्स, प्रॉपर्टी टैक्स इसके उदाहरण हैं। अप्रत्यक्ष कर वो है जो चीजों की खरीद-फरोख्त पर लगता है और इसका बोझ आप दूसरों पर डाल सकते हैं। जीएसटी, एक्साइज ड्यूटी अप्रत्यक्ष कर हैं।

7. FRBM Act क्या है और यह क्यों जरूरी है?

FRBM यानी राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम 2003 में बनाया गया था। इसका उद्देश्य सरकार को राजकोषीय अनुशासन में रखना है। इसमें तय किया गया कि राजकोषीय घाटा जीडीपी के 3 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होना चाहिए और राजस्व घाटा धीरे-धीरे खत्म करना है। यह जरूरी है ताकि सरकार बेलगाम खर्च न करे और देश कर्ज के जाल में न फंसे।

8. गुणक प्रभाव या Multiplier Effect क्या है?

जब सरकार 100 रुपये खर्च करती है तो उसका असर अर्थव्यवस्था पर 100 से ज्यादा होता है। मान लीजिए सरकार ने एक मजदूर को 100 रुपये दिए। वो उससे 80 रुपये का राशन खरीदता है। दुकानदार उन 80 में से 60 रुपये कपड़े खरीदता है। कपड़े वाला 40 रुपये दवाई पर खर्च करता है। इस तरह 100 रुपये का खर्च कई गुना असर दिखाता है। यही गुणक प्रभाव है।


इस तरह राजकोषीय नीति सरकार का सबसे शक्तिशाली औजार है जिससे वो पूरे देश की अर्थव्यवस्था को दिशा देती है। हर साल फरवरी में जब बजट पेश होता है तो वो सिर्फ संख्याओं का खेल नहीं होता, बल्कि 140 करोड़ लोगों की जिंदगी को प्रभावित करने वाला फैसला होता है। अब जब आप अगली बार बजट देखें तो आप समझ सकेंगे कि हर घोषणा का क्या मतलब है और वो आपको कैसे प्रभावित करने वाली है।


    अगर आप इसी तरह आसान भाषा में उदाहरण के साथ मौद्रिक नीति के बारे में भी जानना चाहते हो तो नीचे दिए गए लिंग पर जाकर जान सकते हो।

👉 मौद्रिक नीति 

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