सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS): जब सरकार की राशन दुकान करोड़ों की जीवनरेखा बनी
लेकिन 15 साल पहले यह कहानी अलग थी। तब रमेश के पिता को राशन दुकान पर कई बार खाली हाथ लौटना पड़ता था। दुकानदार कहता - "माल आया ही नहीं।" या फिर घटिया अनाज मिलता जो खाने लायक नहीं होता। और कभी-कभी वह अनाज भी काला बाजार में बिक जाता।
क्या बदल गया? सार्वजनिक वितरण प्रणाली (Public Distribution System - PDS) में क्रांतिकारी सुधार हुए। आधार से जुड़ गया, डिजिटल हो गया, पारदर्शी हो गया। आज हम इसी यात्रा को समझेंगे - PDS क्या है, कैसे काम करता है, क्या समस्याएं हैं और कैसे सुधार हुए।
PDS क्या है - परिभाषा और उद्देश्य
सार्वजनिक वितरण प्रणाली (Public Distribution System) भारत सरकार द्वारा चलाई जाने वाली एक खाद्य सुरक्षा व्यवस्था है। इसके तहत गरीब और कमजोर वर्गों को रियायती दरों पर खाद्यान्न और आवश्यक वस्तुएं उपलब्ध कराई जाती हैं।
सरल भाषा में: सरकार किसानों से अनाज खरीदती है। फिर इसे गरीबों को बहुत सस्ते दाम पर देती है। यह सब राशन की दुकानों (Fair Price Shops) के माध्यम से होता है।
मुख्य उद्देश्य
खाद्य सुरक्षा: यह सुनिश्चित करना कि किसी को भूखा न रहना पड़े। हर गरीब परिवार को न्यूनतम अनाज मिले।
मूल्य स्थिरता: जब बाजार में अनाज की कीमतें बढ़ती हैं तो गरीब परिवार प्रभावित होते हैं। PDS के माध्यम से उन्हें स्थिर दरों पर अनाज मिलता है।
सामाजिक न्याय: संपत्ति का पुनर्वितरण। अमीर-गरीब के बीच की खाई कम करना।
किसानों को सहायता: सरकार किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर अनाज खरीदती है। इससे किसानों को उचित दाम मिलता है।
PDS का इतिहास - जड़ों से आज तक
द्वितीय विश्व युद्ध काल (1939-1947)
PDS की शुरुआत ब्रिटिश काल में हुई थी द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान। तब खाद्यान्न की भारी कमी थी। ब्रिटिश सरकार ने राशनिंग व्यवस्था शुरू की ताकि सीमित अनाज को न्यायपूर्ण तरीके से बांटा जा सके।
आजादी के बाद (1947-1965)
शुरुआत में PDS सिर्फ शहरी क्षेत्रों में था। ग्रामीण क्षेत्रों में नहीं था क्योंकि वहां किसान खुद अनाज उगाते थे।
हरित क्रांति के बाद (1965-1990)
1960 के दशक में खाद्यान्न संकट आया। भारत को अमेरिका से गेहूं मंगाना पड़ा। इसके बाद हरित क्रांति आई। गेहूं और चावल का उत्पादन बढ़ा। PDS का विस्तार हुआ।
1992 में महत्वपूर्ण बदलाव: Revamped Public Distribution System (RPDS) शुरू हुई। इसमें पहली बार गरीबों को विशेष प्राथमिकता दी गई। पहले सबको एक जैसी दरें थीं।
लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली - TPDS (1997)
1997 में Targeted Public Distribution System (TPDS) आई। अब राशन कार्ड दो श्रेणियों में बांटे गए:
- BPL (Below Poverty Line): गरीबी रेखा से नीचे के परिवार। इन्हें बहुत सस्ते दाम पर अनाज।
- APL (Above Poverty Line): गरीबी रेखा से ऊपर। इन्हें थोड़ा महंगा लेकिन बाजार से सस्ता।
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (2013)
यह PDS के इतिहास में सबसे बड़ा कदम था। इस कानून ने खाद्य सुरक्षा को कानूनी अधिकार बना दिया।
मुख्य प्रावधान:
- देश की लगभग 67% आबादी को कवर करना
- प्राथमिकता परिवारों को 5 किलो प्रति व्यक्ति प्रति माह अनाज
- अंत्योदय परिवारों (सबसे गरीब) को 35 किलो प्रति परिवार
- बहुत सस्ती दरें - गेहूं ₹2/किलो, चावल ₹3/किलो, मोटे अनाज ₹1/किलो
PDS की संरचना - कैसे काम करता है
PDS एक जटिल तंत्र है जिसमें कई स्तर हैं।
चरण 1: अनाज की खरीद
- भारतीय खाद्य निगम (FCI): यह सरकारी संस्था है जो किसानों से अनाज खरीदती है। FCI न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर खरीदता है।
- MSP क्या है: यह वह न्यूनतम कीमत है जो सरकार किसानों को गारंटी देती है। चाहे बाजार में कीमत कितनी भी गिरे, सरकार इतना तो देगी ही।
- खरीद केंद्र: पूरे देश में हजारों खरीद केंद्र हैं जहां किसान अपना अनाज बेच सकते हैं।
चरण 2: भंडारण
- FCI के पास देशभर में गोदाम हैं। यहां अनाज सुरक्षित रखा जाता है। लेकिन कई बार भंडारण क्षमता कम पड़ जाती है और अनाज खुले में रखना पड़ता है। बारिश में नुकसान होता है।
चरण 3: राज्यों को आवंटन
- केंद्र सरकार हर राज्य को अनाज आवंटित करती है। यह आवंटन उस राज्य की आबादी और जरूरत के आधार पर होता है।
चरण 4: राज्य के भीतर वितरण
- राज्य सरकार अनाज को जिलों में बांटती है। जिला प्रशासन इसे राशन दुकानों तक पहुंचाता है।
चरण 5: राशन दुकान से जनता तक
- राशन दुकानदार: ये आमतौर पर निजी व्यक्ति होते हैं जिन्हें सरकार ने लाइसेंस दिया है। वे सरकारी दरों पर अनाज बेचते हैं।
- राशन कार्ड: जिसके पास यह कार्ड है, वही अनाज खरीद सकता है। कार्ड पर परिवार के सदस्यों की संख्या लिखी होती है।
राशन कार्ड के प्रकार
1. अंत्योदय अन्न योजना (AAY) कार्ड
- यह सबसे गरीब परिवारों के लिए है - बेघर, भिखारी, विकलांग, वृद्ध जिनके पास कोई सहारा नहीं।
- लाभ: प्रति परिवार 35 किलो अनाज। सबसे सस्ती दरें।
2. प्राथमिकता परिवार (PHH - Priority Household)
- यह BPL परिवारों के लिए है।
- लाभ: 5 किलो प्रति व्यक्ति प्रति माह।
3. गैर-प्राथमिकता परिवार (Non-Priority)
- यह APL परिवारों के लिए था। लेकिन राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के बाद इनकी संख्या बहुत कम हो गई है। अब ज्यादातर परिवार प्राथमिकता श्रेणी में हैं।
PDS में मिलने वाली वस्तुएं
मुख्य खाद्यान्न
- गेहूं और चावल: यह मुख्य वस्तुएं हैं जो हर राशन दुकान पर मिलती हैं। दरें राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत तय हैं।
- मोटे अनाज: कुछ राज्यों में बाजरा, ज्वार जैसे मोटे अनाज भी मिलते हैं।
अन्य वस्तुएं (राज्य पर निर्भर)
कुछ राज्य अतिरिक्त वस्तुएं भी देते हैं:
- चीनी • खाद्य तेल • मिट्टी का तेल (अब कम हो गया क्योंकि LPG आ गया) • दाल • नमक • साबुन
- यह राज्य की वित्तीय क्षमता पर निर्भर करता है। कुछ राज्य (जैसे तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश) बहुत उदार PDS चलाते हैं।
PDS की समस्याएं - कहां अटक रहा है
1. रिसाव और भ्रष्टाचार
यह सबसे बड़ी समस्या रही है। अनुमान है कि PDS के अनाज का 40-50% काला बाजार में चला जाता था।
कैसे होता था:
- दुकानदार कम तौलता था - 4.5 किलो देकर 5 किलो का रसीद काटता
- फर्जी राशन कार्ड - मृत लोगों, प्रवासियों के नाम पर कार्ड
- Ghost Cards - ऐसे कार्ड जो सिर्फ कागजों में हैं
- अनाज की गुणवत्ता - सरकारी गोदाम से अच्छा अनाज निकालकर खराब अनाज रख देना
उदाहरण: बिहार में एक सर्वेक्षण में पाया गया कि 50% से ज्यादा अनाज गरीबों तक नहीं पहुंच रहा था।
2. गलत लक्ष्यीकरण
जो वास्तव में गरीब हैं, उन्हें कार्ड नहीं मिलता। जो अमीर हैं, उनके पास BPL कार्ड है। यह बहुत बड़ी समस्या थी।
कारण:
- राजनीतिक दबाव - स्थानीय नेता अपने चहेतों को BPL कार्ड दिलवा देते थे
- भ्रष्टाचार - रिश्वत देकर कार्ड बनवाना
- पुराने डेटा - कई लोग अब गरीब नहीं रहे लेकिन कार्ड अभी भी है
3. अपर्याप्त भंडारण
FCI के पास पर्याप्त गोदाम नहीं हैं। खुले में अनाज रखने से बारिश, चूहों, सड़न से नुकसान होता है।
- आंकड़े: कुछ साल भंडारण में 10-15% अनाज बर्बाद हो जाता था।
4. परिवहन की लागत
- अनाज को एक राज्य से दूसरे राज्य, फिर गोदाम से दुकान तक ले जाने में भारी खर्च। यह PDS को महंगा बनाता है।
5. राज्यों के बीच असमानता
- कुछ राज्य (तमिलनाडु, छत्तीसगढ़) बहुत अच्छा PDS चलाते हैं। कुछ (बिहार, उत्तर प्रदेश) में PDS कमजोर है। यह गरीबों के लिए अन्यायपूर्ण है।
6. प्रवासी मजदूरों की समस्या
- जो मजदूर काम के लिए एक राज्य से दूसरे राज्य जाते हैं, वे अपने राशन कार्ड का इस्तेमाल नहीं कर पाते थे। राशन कार्ड एक जगह से बंधा था।
PDS में सुधार - डिजिटल क्रांति
पिछले 10-15 सालों में PDS में बड़े सुधार हुए हैं।
1. राशन कार्ड का आधार से लिंक
यह सबसे महत्वपूर्ण सुधार था। अब राशन कार्ड आधार से जुड़ा है।
फायदे:
- डुप्लीकेट और फर्जी कार्ड खत्म हुए
- मृत लोगों के नाम के कार्ड रद्द हो गए
- बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण - अंगूठे का निशान या आंख की स्कैन से पहचान
2. ऑनलाइन आवंटन और ट्रैकिंग
- अब पूरी प्रक्रिया डिजिटल है। कितना अनाज कहां जा रहा है, किसको मिला - सब रिकॉर्ड में।
- पारदर्शिता: कोई भी ऑनलाइन देख सकता है कि उसके गांव की राशन दुकान को कितना अनाज आवंटित हुआ।
3. Point of Sale (PoS) मशीनें
- राशन दुकानों पर इलेक्ट्रॉनिक मशीनें लगाई गईं। जब कोई अनाज लेता है तो उसकी बायोमेट्रिक पहचान होती है और तुरंत रिकॉर्ड अपडेट हो जाता है।
- फायदा: दुकानदार घोटाला नहीं कर सकता। पूरा डेटा सरकारी सर्वर पर जाता है।
4. One Nation One Ration Card (ONORC)
- यह क्रांतिकारी कदम है। अब प्रवासी मजदूर देश में कहीं भी अपने राशन कार्ड से अनाज ले सकते हैं।
- उदाहरण: बिहार का एक मजदूर दिल्ली में काम करता है। अब वह दिल्ली की किसी भी राशन दुकान से अपने बिहार के राशन कार्ड से अनाज ले सकता है।
5. डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) - विकल्प
- कुछ राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में प्रयोग किया गया - अनाज की जगह सीधे पैसा देना। लेकिन यह सर्वत्र सफल नहीं रहा क्योंकि बाजार में भी कीमतें बढ़ गईं।
6. FCI का आधुनिकीकरण
- गोदामों में सुधार, वैज्ञानिक भंडारण, ऑनलाइन इन्वेंटरी मैनेजमेंट।
PDS के लाभ और सफलताएं
खाद्य सुरक्षा
- लाखों गरीब परिवारों को भोजन की गारंटी। अकाल और भुखमरी की घटनाएं लगभग खत्म।
मूल्य स्थिरता
- बाजार में कीमतें चाहे कितनी भी बढ़ें, गरीबों को स्थिर दर पर अनाज मिलता है। मुद्रास्फीति से सुरक्षा।
महिला सशक्तिकरण
- ज्यादातर राशन कार्ड महिलाओं के नाम पर हैं। यह परिवार में उनकी स्थिति मजबूत करता है।
किसानों को फायदा
- MSP के कारण किसानों को अपनी फसल का उचित दाम मिलता है। यह एक safety net है।
कोविड-19 के दौरान भूमिका
- महामारी के दौरान जब सब कुछ बंद था, PDS ने करोड़ों लोगों को राहत दी। मुफ्त अनाज वितरण किया गया।
PDS के विकल्प और सुझाव
1. Cash Transfer
कुछ अर्थशास्त्री कहते हैं - अनाज की जगह सीधे पैसा दे दो। लोग अपनी पसंद का खाना खरीदेंगे।
- फायदे: भ्रष्टाचार खत्म, पसंद की आजादी, PDS चलाने का खर्च बचेगा।
- नुकसान: बाजार में कीमतें बढ़ सकती हैं, पैसा गलत जगह खर्च हो सकता है, हर जगह दुकानें नहीं हैं।
2. सार्वभौमिक PDS (Universal PDS)
सबको एक जैसा देना - अमीर-गरीब में भेद न करना। तमिलनाडु ने यह किया था।
- फायदा: कोई बहिष्करण नहीं, गलत लक्ष्यीकरण की समस्या नहीं।
- नुकसान: बहुत महंगा, अमीरों को सब्सिडी क्यों?
3. प्राइवेट भागीदारी
राशन दुकानों को निजी कंपनियों या NGOs को देना।
- फायदा: बेहतर सेवा, दक्षता।
- नुकसान: मुनाफाखोरी का डर, गरीबों की पहुंच से दूर हो सकता है।
परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण बिंदु
• PDS की शुरुआत - द्वितीय विश्व युद्ध (1939-45)
• TPDS - 1997 में शुरू, BPL और APL में विभाजन
• राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम - 2013, 67% आबादी को कवर
• राशन कार्ड के प्रकार - AAY, PHH (Priority), Non-Priority
• NFSA दरें - गेहूं ₹2/किलो, चावल ₹3/किलो, मोटे अनाज ₹1/किलो
• FCI - भारतीय खाद्य निगम, अनाज की खरीद और भंडारण
• MSP - न्यूनतम समर्थन मूल्य, किसानों को गारंटी
• One Nation One Ration Card - प्रवासियों के लिए
• POS मशीनें - बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण
• मुख्य समस्याएं - रिसाव, भ्रष्टाचार, गलत लक्ष्यीकरण
निष्कर्ष
PDS भारत की सबसे बड़ी खाद्य सुरक्षा योजनाओं में से एक है। यह करोड़ों गरीब परिवारों की जीवनरेखा है। द्वितीय विश्व युद्ध में शुरू हुई एक आपातकालीन व्यवस्था आज एक स्थायी संस्था बन गई है।
लेकिन यात्रा आसान नहीं रही। दशकों तक PDS भ्रष्टाचार और अक्षमता का पर्याय था। अनाज गरीबों तक पहुंचने से पहले काला बाजार में बिक जाता था। फर्जी राशन कार्ड थे, दुकानदार घोटाले करते थे, गोदामों में अनाज सड़ता था।
लेकिन पिछले 10-15 सालों में जबरदस्त सुधार हुए। आधार लिंकिंग ने फर्जी कार्ड खत्म किए। डिजिटलीकरण ने पारदर्शिता लाई। PoS मशीनों ने दुकानदारों का घोटाला मुश्किल कर दिया। One Nation One Ration Card ने प्रवासी मजदूरों की समस्या हल की।
कोविड-19 महामारी के दौरान PDS की अहमियत और साफ हो गई। जब सब कुछ बंद था, लाखों लोग बेरोजगार थे, तब PDS ने उन्हें भूखे नहीं मरने दिया। मुफ्त अनाज वितरण किया गया।
लेकिन अभी भी काम बाकी है। कुछ राज्यों में PDS मजबूत है (तमिलनाडु, छत्तीसगढ़, ओडिशा), कुछ में कमजोर। गुणवत्ता की समस्या है - कभी-कभी घटिया अनाज मिलता है। भंडारण सुधारना है। और सबसे बड़ी बहस - क्या PDS जारी रखना चाहिए या Cash Transfer पर जाना चाहिए।
मेरी राय में, PDS एक जरूरी सुरक्षा जाल है। लेकिन इसे और सुधारना होगा - ज्यादा डिजिटल, ज्यादा पारदर्शी, ज्यादा कुशल। साथ ही गुणवत्ता पर ध्यान देना होगा। क्योंकि गरीबों को भी अच्छा खाने का अधिकार है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रश्न 1: PDS क्या है और इसका उद्देश्य क्या है?
उत्तर: PDS (Public Distribution System) या सार्वजनिक वितरण प्रणाली भारत सरकार द्वारा चलाई जाने वाली खाद्य सुरक्षा व्यवस्था है। इसके तहत गरीब और कमजोर वर्गों को राशन की दुकानों के माध्यम से रियायती दरों पर खाद्यान्न (गेहूं, चावल) और अन्य आवश्यक वस्तुएं उपलब्ध कराई जाती हैं। मुख्य उद्देश्य हैं: (1) खाद्य सुरक्षा - किसी को भूखा न रहना पड़े, (2) मूल्य स्थिरता - बाजार में महंगाई से सुरक्षा, (3) सामाजिक न्याय - गरीबों की मदद।
प्रश्न 2: राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) 2013 क्या है?
उत्तर: यह 2013 में पारित कानून है जिसने खाद्य सुरक्षा को कानूनी अधिकार बना दिया। मुख्य प्रावधान: (1) देश की लगभग 67% आबादी को कवरेज, (2) प्राथमिकता परिवारों को 5 किलो प्रति व्यक्ति प्रति माह, (3) अंत्योदय परिवारों (सबसे गरीब) को 35 किलो प्रति परिवार, (4) बहुत सस्ती दरें - गेहूं ₹2/किलो, चावल ₹3/किलो, मोटे अनाज ₹1/किलो। अगर सरकार अनाज नहीं दे पाती तो मुआवजा देना होगा। यह PDS के इतिहास में सबसे बड़ा कदम था।
प्रश्न 3: राशन कार्ड कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर: मुख्यतः तीन प्रकार: (1) अंत्योदय अन्न योजना (AAY) कार्ड - सबसे गरीब परिवारों के लिए (बेघर, विकलांग, वृद्ध), 35 किलो प्रति परिवार सबसे सस्ती दर पर, (2) प्राथमिकता परिवार (Priority Household - PHH) - गरीबी रेखा से नीचे के परिवार, 5 किलो प्रति व्यक्ति, (3) गैर-प्राथमिकता (Non-Priority) - गरीबी रेखा से ऊपर, लेकिन NFSA के बाद इनकी संख्या बहुत कम हो गई है। कुछ राज्यों में अलग-अलग नाम (जैसे सफेद, पीला, केसरी कार्ड)।
प्रश्न 4: PDS की मुख्य समस्याएं क्या हैं?
उत्तर: मुख्य समस्याएं: (1) रिसाव और भ्रष्टाचार - 40-50% अनाज काला बाजार में जाता था, दुकानदार कम तौलते थे, (2) गलत लक्ष्यीकरण - असली गरीबों को कार्ड नहीं, अमीरों के पास BPL कार्ड, (3) फर्जी कार्ड - मृत लोगों, प्रवासियों के नाम पर कार्ड, (4) अपर्याप्त भंडारण - गोदामों की कमी, अनाज खुले में सड़ना, (5) गुणवत्ता - घटिया अनाज, (6) प्रवासी मजदूरों की समस्या - दूसरे राज्य में कार्ड काम नहीं करता था।
प्रश्न 5: PDS में क्या सुधार हुए हैं?
उत्तर: पिछले 10-15 सालों में बड़े सुधार: (1) आधार लिंकिंग - फर्जी कार्ड खत्म, बायोमेट्रिक पहचान, (2) डिजिटलीकरण - पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन, पारदर्शिता बढ़ी, (3) PoS मशीनें - राशन दुकानों पर इलेक्ट्रॉनिक मशीनें, घोटाला मुश्किल, (4) One Nation One Ration Card (ONORC) - देश में कहीं भी अनाज ले सकते हैं, प्रवासियों के लिए वरदान, (5) FCI आधुनिकीकरण - बेहतर भंडारण, ऑनलाइन इन्वेंटरी। इन सुधारों से रिसाव काफी कम हुआ है।
प्रश्न 6: One Nation One Ration Card क्या है?
उत्तर: यह एक क्रांतिकारी सुधार है जो प्रवासी मजदूरों की समस्या हल करता है। पहले राशन कार्ड एक जगह से बंधा था - अगर आपका कार्ड बिहार में बना है तो सिर्फ बिहार में ही काम करेगा। लेकिन ONORC के बाद अब आप देश में कहीं भी किसी भी राशन दुकान से अपने राशन कार्ड से अनाज ले सकते हैं। उदाहरण: बिहार का मजदूर दिल्ली में काम कर रहा है, वह दिल्ली की दुकान से अपने बिहार के कार्ड से अनाज ले सकता है। यह पूरी तरह डिजिटल है।
प्रश्न 7: FCI की क्या भूमिका है?
उत्तर: FCI (Food Corporation of India) या भारतीय खाद्य निगम PDS की रीढ़ है। इसकी मुख्य भूमिकाएं: (1) अनाज की खरीद - किसानों से MSP (न्यूनतम समर्थन मूल्य) पर गेहूं और चावल खरीदना, (2) भंडारण - देशभर के गोदामों में अनाज सुरक्षित रखना, (3) परिवहन - अनाज को एक राज्य से दूसरे राज्य ले जाना, (4) राज्यों को आवंटन - हर राज्य को उसकी जरूरत के अनुसार अनाज देना। FCI की स्थापना 1965 में हुई थी। यह दुनिया की सबसे बड़ी अनाज संभालने वाली संस्थाओं में से एक है।
प्रश्न 8: MSP क्या है और PDS से इसका क्या संबंध?
उत्तर: MSP (Minimum Support Price) या न्यूनतम समर्थन मूल्य वह न्यूनतम कीमत है जो सरकार किसानों को उनकी फसल के लिए गारंटी देती है। PDS से संबंध: (1) FCI किसानों से MSP पर अनाज खरीदता है, (2) यह अनाज PDS के माध्यम से गरीबों को दिया जाता है, (3) MSP से किसानों को फायदा - बाजार में कीमत चाहे कितनी भी गिरे, सरकार तो MSP देगी ही, (4) PDS और MSP मिलकर दोनों तरफ सुरक्षा देते हैं - किसानों को (उत्पादक) और गरीबों को (उपभोक्ता)।
प्रश्न 9: Cash Transfer और PDS में क्या अंतर है?
उत्तर: Cash Transfer में अनाज की जगह सीधे पैसा दिया जाता है, लोग बाजार से खरीदते हैं। PDS में सरकार अनाज देती है। Cash Transfer के फायदे: भ्रष्टाचार कम, पसंद की आजादी, PDS चलाने का खर्च बचेगा। नुकसान: बाजार में कीमतें बढ़ सकती हैं, पैसा गलत खर्च हो सकता है, दूरदराज इलाकों में दुकानें नहीं, मुद्रास्फीति का जोखिम। PDS के फायदे: सीधे अनाज मिलता है, कीमतें स्थिर, बुनियादी जरूरत पूरी होती है। कुछ अर्थशास्त्री Cash Transfer के पक्ष में हैं लेकिन अभी PDS ही चल रहा है।
प्रश्न 10: कोविड-19 में PDS की क्या भूमिका थी?
उत्तर: कोविड-19 महामारी के दौरान PDS ने जीवनरक्षक भूमिका निभाई। जब लॉकडाउन था, करोड़ों लोग बेरोजगार हो गए, प्रवासी मजदूर फंस गए, तब सरकार ने PDS के माध्यम से: (1) मुफ्त अनाज वितरण - नियमित कोटे के अलावा अतिरिक्त मुफ्त अनाज, (2) ONORC की तेज शुरुआत - फंसे प्रवासियों को कहीं भी राशन, (3) दालों का वितरण - कुछ राज्यों में, (4) डिजिटल सुविधा से बिना भीड़ के वितरण। अनुमान है कि इससे लाखों लोग भूखे मरने से बचे। PDS की अहमियत और साफ हो गई।
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