भारतीय बैंकिंग प्रणाली क्या है? संरचना, कार्य, Money Multiplier और सुधार

 बैंकिंग प्रणाली: जब एक साधारण तिजोरी पूरी अर्थव्यवस्था की धड़कन बन गई

भारतीय बैंकिंग प्रणाली क्या है? संरचना, कार्य, Money Multiplier और सुधार
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        1969 की एक रात, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अचानक रेडियो पर घोषणा की - "देश के 14 सबसे बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया जा रहा है।" उस समय देश के 70% बैंकिंग कारोबार पर इन 14 बैंकों का नियंत्रण था। यह फैसला इतना अचानक था कि बैंक मालिकों को पता भी नहीं चला।

    अगली सुबह जब लोग बैंकों में गए तो उन्हें आश्चर्य हुआ - वही बैंक, वही कर्मचारी, लेकिन अब मालिक सरकार। उस एक रात में भारतीय बैंकिंग प्रणाली की दिशा ही बदल गई। गांवों तक बैंकिंग पहुंची, गरीबों को कर्ज मिलने लगा, किसानों को राहत मिली।

    लेकिन सवाल यह है - बैंकिंग प्रणाली है क्या? यह कैसे काम करती है? कैसे आपकी जेब में पड़े ₹100 पूरी अर्थव्यवस्था को चलाने में मदद करते हैं? आज हम इसी की पूरी कहानी समझेंगे।


बैंकिंग प्रणाली क्या है - सरल परिभाषा

    बैंकिंग प्रणाली वह व्यवस्था है जिसके माध्यम से बैंक जमा स्वीकार करते हैं, कर्ज देते हैं, और वित्तीय सेवाएं प्रदान करते हैं। यह अर्थव्यवस्था की रीढ़ है - इसके बिना आधुनिक अर्थव्यवस्था की कल्पना नहीं की जा सकती।

सरल भाषा में: जिनके पास पैसे हैं (बचतकर्ता), वे बैंक में जमा करते हैं। जिन्हें पैसों की जरूरत है (उधारकर्ता), वे बैंक से कर्ज लेते हैं। बैंक इन दोनों के बीच पुल का काम करता है।

लेकिन यह सिर्फ इतना ही नहीं है। बैंकिंग प्रणाली:

  • मुद्रा आपूर्ति को नियंत्रित करती है
  • भुगतान प्रणाली चलाती है (चेक, UPI, NEFT)
  • विदेशी मुद्रा का प्रबंधन करती है
  • सरकार की राजकोषीय नीति को लागू करने में मदद करती है

भारतीय बैंकिंग प्रणाली की संरचना

    भारतीय बैंकिंग प्रणाली एक पिरामिड की तरह है। सबसे ऊपर भारतीय रिज़र्व बैंक, फिर वाणिज्यिक बैंक, और सबसे नीचे ग्रामीण बैंक।

A) भारतीय रिज़र्व बैंक - सर्वोच्च बैंक

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) केंद्रीय बैंक है। यह "बैंकों का बैंक" है। इसकी स्थापना 1935 में हुई थी।

RBI के मुख्य कार्य:

  • मौद्रिक प्राधिकरण: यह देश की मौद्रिक नीति बनाता है। रेपो रेट, CRR, SLR जैसे औजारों से मुद्रास्फीति और आर्थिक वृद्धि को नियंत्रित करता है।
  • मुद्रा जारीकर्ता: ₹1 के नोट को छोड़कर सभी नोट RBI जारी करता है। ₹1 का नोट वित्त मंत्रालय जारी करता है।
  • बैंकों का नियामक: सभी बैंकों को RBI के नियमों का पालन करना पड़ता है। यह लाइसेंस देता है, निरीक्षण करता है, और गलती पर दंड देता है।
  • सरकार का बैंकर: केंद्र और राज्य सरकारों के बैंकिंग लेन-देन RBI के माध्यम से होते हैं।
  • विदेशी मुद्रा प्रबंधक: विदेशी मुद्रा भंडार का प्रबंधन करता है। विनिमय दर को स्थिर रखने के लिए हस्तक्षेप करता है।

B) वाणिज्यिक बैंक - जनता के बैंक

ये वे बैंक हैं जो सीधे जनता से व्यवहार करते हैं। ये तीन प्रकार के होते हैं:

  • सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक: जिनमें सरकार का बहुमत (51% से ज्यादा) हिस्सा है। उदाहरण: भारतीय स्टेट बैंक, पंजाब नेशनल बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा।
  • निजी क्षेत्र के बैंक: जिनमें निजी शेयरधारकों का स्वामित्व है। उदाहरण: HDFC Bank, ICICI Bank, Axis Bank।
  • विदेशी बैंक: विदेशी मूल के बैंक जो भारत में काम करते हैं। उदाहरण: Citibank, HSBC, Standard Chartered।

C) सहकारी बैंक

ये सहकारी सिद्धांतों पर काम करते हैं। सदस्यों के स्वामित्व में होते हैं। मुख्यतः कृषि और छोटे व्यवसायों को कर्ज देते हैं।

  • शहरी सहकारी बैंक: शहरों में काम करते हैं।
  • ग्रामीण सहकारी बैंक: गांवों में काम करते हैं। इनकी तीन स्तरीय संरचना है - प्राथमिक कृषि साख समिति, केंद्रीय सहकारी बैंक, राज्य सहकारी बैंक।

D) क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक

1975 में स्थापित। गांवों और छोटे शहरों में बैंकिंग सेवाएं देने के लिए। इनका स्वामित्व केंद्र सरकार (50%), राज्य सरकार (15%), और प्रायोजक बैंक (35%) में बंटा होता है।

E) लघु वित्त बैंक और भुगतान बैंक

  • लघु वित्त बैंक (Small Finance Banks): छोटे व्यवसायों, किसानों, और असंगठित क्षेत्र को सेवाएं देते हैं। उदाहरण: AU Small Finance Bank, Ujjivan Small Finance Bank।
  • भुगतान बैंक (Payments Banks): जमा स्वीकार करते हैं (अधिकतम ₹2 लाख प्रति खाता) लेकिन कर्ज नहीं देते। उदाहरण: India Post Payments Bank, Airtel Payments Bank।


बैंक कैसे काम करता है - जादू की तिजोरी

बैंक का काम बहुत सरल लगता है - जमा लो, कर्ज दो। लेकिन असली जादू तो "मुद्रा गुणक" में है।

मुद्रा निर्माण की प्रक्रिया

    मान लीजिए आपने बैंक में ₹10,000 जमा किए। बैंक को RBI के नियम के अनुसार 4% CRR (नकद आरक्षित अनुपात) में रखना होगा। यानी ₹400।

बाकी ₹9,600 बैंक किसी को कर्ज दे सकता है। मान लीजिए राहुल को कर्ज मिला। राहुल ने वह पैसा किसी दुकान में खर्च किया। दुकानदार ने फिर बैंक में जमा किया।

अब बैंक के पास ₹9,600 आ गए। इसमें से फिर 4% (₹384) CRR में, बाकी ₹9,216 फिर कर्ज में दे दिया।

यह प्रक्रिया चलती रहती है। आपके ₹10,000 से अर्थव्यवस्था में कुल ₹2.5 लाख की मुद्रा आपूर्ति बढ़ सकती है। यह है मुद्रा गुणक (Money Multiplier) का जादू।

सूत्र: Money Multiplier = 1 / CRR

अगर CRR 4% है, तो Money Multiplier = 1/0.04 = 25

यानी ₹1 की जमा से ₹25 की मुद्रा सृजन हो सकता है।


बैंकिंग प्रणाली के मुख्य कार्य

1. जमा स्वीकार करना

बैंक विभिन्न प्रकार की जमा स्वीकार करते हैं:

  • बचत खाता: रोजमर्रा के लेन-देन के लिए। कम ब्याज (2.5-3%)।
  • चालू खाता: व्यवसायों के लिए। कोई ब्याज नहीं लेकिन असीमित लेन-देन।
  • सावधि जमा (Fixed Deposit): एक निश्चित अवधि के लिए। ऊंची ब्याज दर।
  • आवर्ती जमा (Recurring Deposit): हर महीने एक निश्चित राशि जमा करना।

2. कर्ज प्रदान करना

  • व्यक्तिगत कर्ज: घर खरीदने, गाड़ी खरीदने, शिक्षा के लिए।
  • व्यावसायिक कर्ज: कंपनियों को विस्तार, कार्यशील पूंजी के लिए।
  • कृषि कर्ज: किसानों को खेती, उपकरण, पशुपालन के लिए।
  • सूक्ष्म वित्त: छोटे व्यवसायों को।

3. भुगतान और निपटान सेवाएं

  • चेक: पारंपरिक तरीका।
  • NEFT/RTGS: इलेक्ट्रॉनिक हस्तांतरण।
  • UPI: तत्काल भुगतान।
  • डेबिट/क्रेडिट कार्ड: कैशलेस लेन-देन।

4. अन्य सेवाएं

  • लॉकर सुविधा: कीमती वस्तुओं की सुरक्षा।
  • विदेशी मुद्रा सेवाएं: विदेश यात्रा के लिए।
  • निवेश सेवाएं: म्यूचुअल फंड, बीमा बेचना।
  • वित्तीय परामर्श: निवेश सलाह।


प्राथमिकता क्षेत्र ऋण - सामाजिक दायित्व

    भारत में बैंकों को अपने कुल कर्ज का एक हिस्सा "प्राथमिकता क्षेत्र" में देना अनिवार्य है। यह सुनिश्चित करता है कि गरीब और कमजोर वर्ग को भी बैंकिंग सेवाएं मिलें।

प्राथमिकता क्षेत्र में शामिल:

• कृषि • सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) • निर्यात कर्ज • शिक्षा कर्ज • आवास कर्ज (₹35 लाख तक) • कमजोर वर्ग (SC/ST, अल्पसंख्यक) • नवीकरणीय ऊर्जा

लक्ष्य:

  • घरेलू अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों के लिए: कुल कर्ज का 40%
  • विदेशी बैंकों के लिए: कुल कर्ज का 40%

अगर कोई बैंक यह लक्ष्य पूरा नहीं करता, तो उसे RIDF (Rural Infrastructure Development Fund) में योगदान देना पड़ता है।


गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां - बैंकों की सबसे बड़ी समस्या

जब कोई उधारकर्ता 90 दिन से ज्यादा समय तक ब्याज या मूलधन नहीं चुकाता, तो वह कर्ज NPA (Non-Performing Asset) बन जाता है।

NPA के प्रकार

1. उप-मानक परिसंपत्ति: 90 दिन से 12 महीने तक NPA रहने पर।

2. संदिग्ध परिसंपत्ति: 12 महीने से ज्यादा NPA रहने पर।

3. हानि परिसंपत्ति: जो पूरी तरह अवसूली योग्य नहीं है।

NPA क्यों समस्या है?

  • लाभप्रदता घटती है: बैंक को उस कर्ज पर प्रावधान (provision) रखना पड़ता है। इससे लाभ कम होता है।
  • नया कर्ज देने की क्षमता कम होती है: जो पैसा NPA में फंसा है, वह नया कर्ज नहीं दिया जा सकता।
  • जमाकर्ताओं के लिए जोखिम: अगर NPA बहुत ज्यादा हो तो बैंक की वित्तीय स्थिति कमजोर हो सकती है।

NPA कम करने के उपाय

  • दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC): 2016 में आया यह कानून NPA समाधान में क्रांतिकारी साबित हुआ। समय सीमा में समाधान अनिवार्य है।
  • बैड बैंक: NARCL (National Asset Reconstruction Company Limited) बनाया गया है जो बैंकों से NPA खरीदकर उनका समाधान करेगा।
  • सतर्कता: कर्ज देने से पहले सही जांच-पड़ताल।
  • कानूनी कार्रवाई: SARFAESI Act के तहत संपत्ति की कुर्की।


बैंकिंग सुधार - विकास की यात्रा

1969 - बैंक राष्ट्रीयकरण

14 बड़े निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण। उद्देश्य था सामाजिक बैंकिंग - गांवों और गरीबों तक पहुंच।

परिणाम:

  • बैंक शाखाएं 8,000 से बढ़कर 60,000 हो गईं (1991 तक)
  • ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग पहुंची
  • कृषि कर्ज बढ़ा

1991 - आर्थिक उदारीकरण

नरसिम्हम समिति की सिफारिशों के आधार पर सुधार शुरू हुए।

मुख्य सुधार:

  • निजी बैंकों को लाइसेंस (HDFC Bank, ICICI Bank आदि आए)
  • पूंजी पर्याप्तता मानदंड (Capital Adequacy Ratio)
  • प्रौद्योगिकी का उपयोग
  • विवेकपूर्ण मानदंड (Prudential Norms)

2014-15 - जन धन योजना

वित्तीय समावेशन का सबसे बड़ा अभियान। उद्देश्य था हर परिवार को बैंक खाता देना।

उपलब्धियां:

  • करोड़ों खाते खुले
  • प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) संभव हुआ
  • डिजिटल भुगतान को बढ़ावा

2020 के बाद - डिजिटल बैंकिंग

UPI की क्रांति: भारत दुनिया में सबसे ज्यादा डिजिटल भुगतान करने वाला देश बन गया।

नियो बैंक: पूरी तरह डिजिटल बैंक (हालांकि भारत में अभी लाइसेंस नहीं मिला)।

Fintech का उदय: बैंकिंग सेवाओं में प्रौद्योगिकी कंपनियों का प्रवेश।


बासेल मानदंड - वैश्विक मानक

बासेल बैंकिंग पर्यवेक्षण समिति ने बैंकों के लिए अंतरराष्ट्रीय मानदंड बनाए हैं। भारत भी इन्हें अपनाता है।

बासेल I (1988)

मुख्य बात: Capital Adequacy Ratio कम से कम 8% होना चाहिए।

यानी बैंक के जोखिम भारित परिसंपत्तियों (Risk Weighted Assets) का 8% पूंजी के रूप में होना चाहिए।

बासेल II (2004)

तीन स्तंभ:

1. न्यूनतम पूंजी आवश्यकता: CAR 9% (भारत में)।

2. पर्यवेक्षी समीक्षा: RBI द्वारा निरीक्षण।

3. बाजार अनुशासन: पारदर्शिता, सूचना प्रकटीकरण।

बासेल III (2010)

2008 की वैश्विक वित्तीय संकट के बाद सख्त मानदंड।

मुख्य बदलाव:

  • CAR बढ़ाकर 10.5% (भारत में)
  • Tier I पूंजी बढ़ाना
  • तरलता मानदंड (Liquidity Coverage Ratio)
  • उत्तोलन अनुपात (Leverage Ratio)

डिजिटल बैंकिंग - भविष्य की बैंकिंग

UPI - भारत की गर्व

    Unified Payments Interface ने भुगतान में क्रांति ला दी। अब कोई भी व्यक्ति मोबाइल नंबर या UPI ID से तुरंत पैसे भेज सकता है।

विशेषताएं:

  • 24×7 उपलब्ध
  • तत्काल हस्तांतरण
  • कोई शुल्क नहीं
  • सुरक्षित

नेट बैंकिंग और मोबाइल बैंकिंग

  • घर बैठे बैंकिंग सेवाएं। बिल भुगतान, हस्तांतरण, निवेश - सब कुछ।

आधार आधारित भुगतान प्रणाली (AEPS)

  • आधार नंबर और फिंगरप्रिंट से भुगतान। बैंक खाते की जरूरत नहीं, सिर्फ आधार लिंक होना चाहिए।

Blockchain और Cryptocurrency

  • भारत में अभी cryptocurrency को मान्यता नहीं है, लेकिन RBI डिजिटल रुपया (Central Bank Digital Currency) पर काम कर रहा है।


बैंकिंग क्षेत्र की चुनौतियां

1. साइबर सुरक्षा

  • डिजिटल बैंकिंग के साथ साइबर अपराध का खतरा बढ़ा है। फिशिंग, हैकिंग, डेटा चोरी।

2. वित्तीय समावेशन

  • अभी भी करोड़ों लोग बैंकिंग सेवाओं से वंचित हैं, खासकर दूरदराज के गांवों में।

3. NPA का बोझ

  • हालांकि सुधार हुआ है, लेकिन NPA अभी भी चिंता का विषय है।

4. प्रतिस्पर्धा

  • Fintech कंपनियां और भुगतान बैंक पारंपरिक बैंकों को कड़ी चुनौती दे रहे हैं।

5. नियामक अनुपालन

  • बढ़ते नियामक मानदंडों का पालन करना महंगा और जटिल है।


परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण बिंदु

• भारतीय रिज़र्व बैंक की स्थापना - 1935, राष्ट्रीयकरण - 1949

• बैंक राष्ट्रीयकरण - 1969 (14 बैंक), 1980 (6 बैंक)

• नरसिम्हम समिति - 1991, 1998 (बैंकिंग सुधारों के लिए)

• क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक - 1975 में स्थापित

• प्राथमिकता क्षेत्र ऋण - 40% (घरेलू बैंक)

• NPA परिभाषा - 90 दिन से ज्यादा भुगतान न होना

• Money Multiplier = 1 / CRR

• Capital Adequacy Ratio (CAR) - कम से कम 9% (भारत में)

• बासेल III मानदंड - 2010 से लागू, भारत में चरणबद्ध तरीके से

• जन धन योजना - 2014, वित्तीय समावेशन के लिए

• IBC (Insolvency and Bankruptcy Code) - 2016

• DICGC बीमा - प्रति खाता ₹5 लाख तक (जमा बीमा)


निष्कर्ष

    बैंकिंग प्रणाली आधुनिक अर्थव्यवस्था का हृदय है। 1969 के राष्ट्रीयकरण से लेकर आज के डिजिटल युग तक, भारतीय बैंकिंग ने लंबा सफर तय किया है।

पहले बैंक सिर्फ अमीरों के लिए थे - संगमरमर के फर्श, ऊंची छत, सूट-बूट में कर्मचारी। लेकिन राष्ट्रीयकरण के बाद बैंक गांव-गांव पहुंचे। किसान को ट्रैक्टर खरीदने के लिए कर्ज मिलने लगा, गरीब महिला को रोजगार शुरू करने के लिए सूक्ष्म वित्त मिलने लगा।

    1991 के सुधारों ने प्रतिस्पर्धा लाई, गुणवत्ता बढ़ी, प्रौद्योगिकी आई। ATM आए, इंटरनेट बैंकिंग शुरू हुई। लेकिन असली क्रांति आई UPI से - अब ठेले वाला भी डिजिटल भुगतान स्वीकार करता है।

लेकिन चुनौतियां भी हैं। NPA का बोझ, साइबर सुरक्षा का खतरा, Fintech की प्रतिस्पर्धा। बैंकों को लगातार खुद को बदलना होगा, प्रौद्योगिकी अपनानी होगी, लेकिन साथ ही मानवीय स्पर्श भी बनाए रखना होगा।

    भविष्य की बैंकिंग डिजिटल होगी, तेज होगी, सुविधाजनक होगी। लेकिन इसकी नींव में वही पुराना सिद्धांत रहेगा - बचतकर्ता और उधारकर्ता के बीच विश्वास का पुल।


अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

प्रश्न 1: भारतीय रिज़र्व बैंक के मुख्य कार्य क्या हैं?

उत्तर: RBI के पांच मुख्य कार्य हैं: (1) मौद्रिक प्राधिकरण - मौद्रिक नीति बनाना, मुद्रास्फीति नियंत्रण, (2) मुद्रा जारीकर्ता - ₹1 को छोड़कर सभी नोट जारी करना, (3) बैंकों का नियामक - सभी बैंकों का पर्यवेक्षण और नियमन, (4) सरकार का बैंकर - सरकारी लेन-देन का प्रबंधन, (5) विदेशी मुद्रा प्रबंधक - विदेशी मुद्रा भंडार का प्रबंधन। इसे "बैंकों का बैंक" भी कहा जाता है।

प्रश्न 2: Money Multiplier क्या है और यह कैसे काम करता है?

उत्तर: Money Multiplier वह प्रक्रिया है जिससे बैंकिंग प्रणाली मुद्रा की आपूर्ति बढ़ाती है। सूत्र: Money Multiplier = 1 / CRR। अगर CRR 4% है, तो multiplier 25 होगा। मतलब ₹1 की जमा से अर्थव्यवस्था में ₹25 की मुद्रा सृजन हो सकता है। यह बार-बार जमा और कर्ज देने की प्रक्रिया से होता है। हर बार बैंक CRR रखकर बाकी राशि कर्ज में दे देता है, जो फिर जमा हो जाती है और चक्र चलता रहता है।

प्रश्न 3: प्राथमिकता क्षेत्र ऋण क्या है?

उत्तर: प्राथमिकता क्षेत्र ऋण वे कर्ज हैं जो बैंकों को कुछ निर्धारित क्षेत्रों में देने अनिवार्य हैं। घरेलू बैंकों को अपने कुल कर्ज का 40% प्राथमिकता क्षेत्र में देना होता है। इसमें शामिल हैं: कृषि, MSME, निर्यात, शिक्षा, आवास (₹35 लाख तक), कमजोर वर्ग। उद्देश्य है यह सुनिश्चित करना कि गरीब और वंचित वर्ग को भी बैंकिंग सेवाएं मिलें। अगर बैंक लक्ष्य पूरा नहीं करता तो RIDF में योगदान देना पड़ता है।

प्रश्न 4: NPA क्या है और यह बैंकों के लिए समस्या क्यों है?

उत्तर: NPA (Non-Performing Asset) वह कर्ज है जिसपर उधारकर्ता 90 दिन से ज्यादा समय से ब्याज या मूलधन नहीं चुका रहा। यह समस्या है क्योंकि: (1) बैंक को प्रावधान रखना पड़ता है जिससे लाभ कम होता है, (2) जो पैसा NPA में फंसा है वह नया कर्ज नहीं दिया जा सकता, (3) बैंक की वित्तीय स्थिति कमजोर होती है, (4) जमाकर्ताओं के लिए जोखिम बढ़ता है। समाधान के लिए IBC Act 2016 और NARCL (बैड बैंक) बनाया गया है।

प्रश्न 5: बासेल मानदंड क्या हैं?

उत्तर: बासेल मानदंड बैंकिंग पर्यवेक्षण के अंतरराष्ट्रीय मानक हैं। बासेल I (1988) ने Capital Adequacy Ratio 8% तय किया। बासेल II (2004) ने तीन स्तंभ दिए - न्यूनतम पूंजी, पर्यवेक्षी समीक्षा, बाजार अनुशासन। बासेल III (2010, वित्तीय संकट के बाद) ने और सख्त मानदंड लाए - CAR 10.5%, Tier I पूंजी बढ़ाना, तरलता मानदंड। भारत इन्हें चरणबद्ध तरीके से लागू कर रहा है।

प्रश्न 6: 1969 में बैंक राष्ट्रीयकरण क्यों किया गया?

उत्तर: 1969 में 14 बड़े निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। कारण: (1) बैंकिंग सेवाएं सिर्फ शहरों और अमीरों तक सीमित थीं, (2) कृषि और छोटे उद्योगों को कर्ज नहीं मिल रहा था, (3) सामाजिक बैंकिंग का उद्देश्य - गांवों और गरीबों तक पहुंच। परिणाम बहुत अच्छे रहे - बैंक शाखाएं 8,000 से 60,000 हो गईं (1991 तक), ग्रामीण बैंकिंग का विस्तार हुआ, कृषि कर्ज बढ़ा।

प्रश्न 7: भुगतान बैंक और लघु वित्त बैंक में क्या अंतर है?

उत्तर: भुगतान बैंक (Payments Banks): जमा स्वीकार करते हैं (अधिकतम ₹2 लाख प्रति खाता), लेकिन कर्ज नहीं देते। सिर्फ भुगतान और remittance सेवाएं। उदाहरण: India Post Payments Bank, Airtel Payments Bank। लघु वित्त बैंक (Small Finance Banks): पूर्ण बैंक हैं जो जमा भी लेते हैं और कर्ज भी देते हैं। फोकस छोटे व्यवसायों, किसानों, असंगठित क्षेत्र पर। उदाहरण: AU Small Finance Bank, Ujjivan।

प्रश्न 8: क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक क्या हैं?

उत्तर: Regional Rural Banks (RRBs) की स्थापना 1975 में हुई थी ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग सेवाएं देने के लिए। इनका स्वामित्व तीन भागों में बंटा है: केंद्र सरकार (50%), राज्य सरकार (15%), प्रायोजक बैंक (35%)। ये छोटे और सीमांत किसानों, कृषि श्रमिकों, ग्रामीण कारीगरों को कर्ज देते हैं। ये वाणिज्यिक बैंकों से सस्ती दर पर कर्ज देते हैं और सहकारी बैंकों से बेहतर प्रबंधन करते हैं।

प्रश्न 9: जन धन योजना का क्या महत्व है?

उत्तर: प्रधानमंत्री जन धन योजना (2014) वित्तीय समावेशन का विश्व का सबसे बड़ा अभियान है। उद्देश्य: हर परिवार को बैंक खाता देना। उपलब्धियां: (1) करोड़ों खाते खुले, विशेषकर गरीब और वंचित वर्ग के, (2) प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) संभव हुआ - सरकारी योजनाओं का पैसा सीधे खाते में, (3) डिजिटल भुगतान को बढ़ावा, (4) रुपे कार्ड, ओवरड्राफ्ट सुविधा। इससे बिचौलियों की भूमिका कम हुई और पारदर्शिता बढ़ी।

प्रश्न 10: DICGC क्या है?

उत्तर: Deposit Insurance and Credit Guarantee Corporation (DICGC) जमाकर्ताओं के पैसों का बीमा करती है। यह RBI की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी है। अगर कोई बैंक फेल हो जाता है तो DICGC प्रति खाता ₹5 लाख तक (मूलधन और ब्याज दोनों मिलाकर) का बीमा देती है। यह बचत खाता, चालू खाता, सावधि जमा, आवर्ती जमा सभी को कवर करती है। उद्देश्य: जमाकर्ताओं में विश्वास बनाए रखना और बैंकिंग स्थिरता सुनिश्चित करना।


इन्‍हें भी देखें-

👉 NPA (गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां) क्या है? कारण, प्रभाव और IBC समाधान

👉 भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) क्या है? | Reserve Bank of India की सम्पूर्ण जानकारी आसान भाषा में

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