गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां (NPA): जब बैंकों का पैसा काले गड्ढे में गायब हो जाए
जांच शुरू हुई तो पता चला - कर्ज लेने के लिए फर्जी दस्तावेज, बैंक के ही कुछ कर्मचारियों की मिलीभगत, और सबसे बड़ी बात - यह कर्ज सालों से NPA की श्रेणी में आ चुका था। लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया।
यह सिर्फ एक मामला नहीं था। विजय माल्या, अनिल अंबानी की कंपनियां, दर्जनों बड़े उद्योगपति - सबने हजारों करोड़ के कर्ज लिए और नहीं चुकाए। नतीजा? आज भारतीय बैंकों पर लाखों करोड़ रुपये के NPA (गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां) का बोझ है।
आज हम समझेंगे कि यह NPA है क्या, यह बैंकों और हमारी अर्थव्यवस्था को कैसे नुकसान पहुंचाता है, और इससे कैसे निपटा जा सकता है।
NPA क्या है - सरल परिभाषा
NPA (Non-Performing Asset) या गैर-निष्पादित परिसंपत्ति वह कर्ज है जिस पर उधारकर्ता ने 90 दिनों से ज्यादा समय तक न तो ब्याज चुकाया है और न मूलधन।
सरल शब्दों में: मान लीजिए किसी व्यक्ति ने बैंक से ₹10 लाख का कर्ज लिया। हर महीने उसे ₹15,000 की किस्त चुकानी है। अगर वह लगातार 3 महीने (90 दिन) तक एक भी किस्त नहीं चुकाता, तो वह कर्ज NPA बन जाता है।
भारतीय रिज़र्व बैंक की परिभाषा: एक परिसंपत्ति (कर्ज) तब NPA बन जाती है जब उस पर ब्याज या मूलधन का भुगतान 90 दिनों से अधिक समय तक बकाया हो। पहले यह सीमा 180 दिन थी, लेकिन 2004 में इसे घटाकर 90 दिन कर दिया गया।
NPA क्यों महत्वपूर्ण है?
जब कोई कर्ज NPA बन जाता है तो बैंक के लिए यह एक मरी हुई संपत्ति है। इस पर न तो आय आ रही है (क्योंकि ब्याज नहीं मिल रहा), और न ही मूलधन वापस आने की संभावना है। यह बैंक की पूंजी को फंसा देता है।
NPA के प्रकार - वर्गीकरण
रिज़र्व बैंक ने NPA को तीन श्रेणियों में बांटा है। यह वर्गीकरण इस आधार पर होता है कि कर्ज कितने समय से NPA बना हुआ है।
1. उप-मानक परिसंपत्ति (Sub-Standard Asset)
जब कोई कर्ज 90 दिन से ज्यादा लेकिन 12 महीने से कम समय तक NPA रहता है, तो उसे उप-मानक परिसंपत्ति कहते हैं।
उदाहरण: राजेश ने मार्च में बैंक से कर्ज लिया। जून से उसने भुगतान बंद कर दिया। सितंबर तक (90 दिन बाद) यह कर्ज NPA बन गया। सितंबर से अगले साल जून तक यह उप-मानक परिसंपत्ति रहेगा।
बैंक का दायित्व: बैंक को इस कर्ज के लिए 15% प्रावधान (provision) रखना पड़ता है। यानी अगर ₹100 का कर्ज है, तो ₹15 अलग से संभावित नुकसान के लिए रखने होंगे।
2. संदिग्ध परिसंपत्ति (Doubtful Asset)
जब कोई कर्ज 12 महीने से ज्यादा समय तक NPA बना रहता है, तो वह संदिग्ध परिसंपत्ति बन जाता है।
विशेषता: इस कर्ज की वसूली की संभावना बहुत कम हो जाती है। संपार्श्विक (collateral) जो गिरवी रखा गया था, उसकी कीमत भी घट सकती है या विवादित हो सकती है।
बैंक का दायित्व: इसके लिए 25% से 100% तक प्रावधान रखना पड़ता है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि यह कितने समय से संदिग्ध है।
3. हानि परिसंपत्ति (Loss Asset)
वह कर्ज जो पूरी तरह अवसूली योग्य नहीं रहा। बैंक या ऑडिटर ने पहचान कर लिया है कि यह पैसा वापस नहीं आएगा।
विशेषता: यह कर्ज बैंक की किताबों में तो है लेकिन इसका मूल्य शून्य है। ऐसे कर्ज को जल्द से जल्द बैंक की बही-खातों से हटा देना चाहिए।
बैंक का दायित्व: 100% प्रावधान। पूरी रकम का नुकसान मान लिया जाता है।
NPA कैसे बनता है - कारण
NPA बनने के कई कारण होते हैं। कुछ वास्तविक होते हैं (genuine reasons), कुछ जानबूझकर (willful default)।
A) आर्थिक मंदी
जब अर्थव्यवस्था में मंदी होती है तो व्यवसाय ठप हो जाते हैं। बिक्री नहीं होती, आय नहीं आती, लेकिन कर्ज चुकाना पड़ता है। ऐसे में कई छोटे व्यवसायी और उद्योग कर्ज नहीं चुका पाते।
उदाहरण: 2008 की वैश्विक मंदी के बाद भारत में NPA तेजी से बढ़े क्योंकि कई उद्योग प्रभावित हुए।
B) गलत परियोजना मूल्यांकन
कई बार बैंक कर्ज देते समय परियोजना का सही मूल्यांकन नहीं करते। जो परियोजना कागजों पर लाभदायक दिखती है, वास्तविकता में असफल हो जाती है।
उदाहरण: एक कंपनी को बिजली संयंत्र लगाने के लिए कर्ज दिया गया। लेकिन कोयले की कमी, भूमि अधिग्रहण की समस्या, पर्यावरण की मंजूरी में देरी - ये सब मिलकर परियोजना को रोक देते हैं। कर्ज NPA बन जाता है।
C) जानबूझकर चूक (Willful Default)
यह सबसे खतरनाक है। कुछ बड़े कर्जदार जानबूझकर कर्ज नहीं चुकाते, हालांकि उनके पास चुकाने की क्षमता होती है। वे पैसा विदेश भेज देते हैं या दूसरे व्यवसायों में लगा देते हैं।
उदाहरण: विजय माल्या का मामला। उन्होंने किंगफिशर एयरलाइंस के लिए हजारों करोड़ का कर्ज लिया। कंपनी बंद हो गई लेकिन कर्ज नहीं चुकाया। खुद विदेश भाग गए।
D) कृषि संकट
भारत में कृषि कर्ज का बड़ा हिस्सा है। सूखा, बाढ़, फसल की कम कीमत - ये सब किसानों को कर्ज चुकाने में असमर्थ बना देते हैं।
E) बैंकिंग प्रणाली की कमजोरियां
- राजनीतिक दबाव: कभी-कभी राजनीतिक दबाव में बैंक गलत लोगों को कर्ज दे देते हैं।
- भ्रष्टाचार: बैंक के अधिकारी रिश्वत लेकर बिना उचित जांच के कर्ज स्वीकृत कर देते हैं।
- कमजोर निगरानी: कर्ज देने के बाद यह देखना जरूरी है कि पैसा सही जगह लग रहा है या नहीं। लेकिन कई बार यह निगरानी नहीं होती।
NPA का प्रभाव - नुकसान का दायरा
NPA सिर्फ बैंकों की समस्या नहीं है। यह पूरी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है।
1. बैंकों की लाभप्रदता घटती है
जब कर्ज NPA बन जाता है तो उस पर ब्याज की आय बंद हो जाती है। साथ ही बैंक को प्रावधान (provision) भी रखना पड़ता है। इससे बैंक का मुनाफा घटता है।
उदाहरण: अगर किसी बैंक का ₹1000 करोड़ का कर्ज NPA बन गया और वह संदिग्ध श्रेणी में है, तो बैंक को ₹500 करोड़ का प्रावधान रखना पड़ेगा। यह सीधे उसके मुनाफे से कटेगा।
2. नया कर्ज देने की क्षमता कम होती है
जो पैसा NPA में फंसा है, वह नए कर्ज के रूप में नहीं दिया जा सकता। इससे अर्थव्यवस्था में साख का प्रवाह कम होता है।
परिणाम: छोटे व्यवसायों और किसानों को कर्ज नहीं मिलता। नए उद्योग नहीं लग पाते। रोजगार के अवसर कम होते हैं।
3. जमाकर्ताओं के लिए जोखिम
अगर किसी बैंक में NPA बहुत ज्यादा हो जाए तो बैंक की वित्तीय स्थिति कमजोर हो जाती है। ऐसे में जमाकर्ताओं का पैसा जोखिम में पड़ सकता है।
हालांकि: DICGC बीमा है जो ₹5 लाख तक की जमा राशि की गारंटी देता है। लेकिन फिर भी लोगों का विश्वास डगमगाता है।
4. सरकार पर बोझ
जब सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक घाटे में चले जाते हैं तो सरकार को उनमें पूंजी डालनी पड़ती है (recapitalization)। यह पैसा करदाताओं का होता है।
उदाहरण: 2017-18 में सरकार ने सार्वजनिक बैंकों में ₹2.11 लाख करोड़ का पुनर्पूंजीकरण किया। यह पैसा जनता के कर से आया।
5. आर्थिक विकास धीमा होता है
NPA से साख सृजन (credit creation) कम होता है। निवेश घटता है। उद्योग बंद होते हैं। रोजगार कम होते हैं। अंततः GDP की वृद्धि धीमी पड़ती है।
NPA की वसूली - कानून और तरीके
भारत में NPA की वसूली के लिए कई कानूनी प्रावधान हैं।
1. SARFAESI Act, 2002
Securitisation and Reconstruction of Financial Assets and Enforcement of Security Interest Act - यह सबसे महत्वपूर्ण कानून है।
मुख्य प्रावधान:
• बैंक बिना अदालत गए उधारकर्ता की संपत्ति जब्त कर सकते हैं। • 60 दिन का नोटिस देना होता है। • कर्जदार के पास 60 दिन में आपत्ति दर्ज करने का अधिकार है। • अगर कर्जदार जवाब नहीं देता तो बैंक संपत्ति का कब्जा ले सकता है और नीलामी कर सकता है।
सीमा: यह कानून ₹1 लाख से कम के कर्ज पर लागू नहीं होता। साथ ही, कृषि भूमि पर भी नहीं।
2. Debt Recovery Tribunals (DRT)
- स्थापना: 1993 में Recovery of Debts Due to Banks and Financial Institutions Act के तहत।
- कार्य: ₹20 लाख से ज्यादा के कर्जों के मामले DRT में जाते हैं। ये विशेष अदालतें हैं जो सिर्फ कर्ज वसूली के मामले सुनती हैं।
- समस्या: इन tribunals में भी मामले सालों लटकते रहते हैं। बैकलॉग बहुत है।
3. Insolvency and Bankruptcy Code (IBC), 2016
यह कानून क्रांतिकारी साबित हुआ।
मुख्य विशेषताएं:
• समय सीमा तय है - 180 दिन (एक बार 90 दिन बढ़ाया जा सकता है) • कंपनी का प्रबंधन मालिकों से लेकर resolution professional को दे दिया जाता है • सभी लेनदारों की समिति बनती है • समाधान योजना लानी होती है - या तो कंपनी को बेच दो, या पुनर्गठित करो, या liquidation करो
सफलता: इस कानून ने बड़े-बड़े NPA मामलों का समाधान किया। एस्सार स्टील, भूषण स्टील, इलेक्ट्रोस्टील जैसे बड़े मामले सुलझे।
प्रभाव: कर्जदारों में डर पैदा हुआ। अब वे जानते हैं कि कर्ज न चुकाने पर कंपनी का नियंत्रण खो सकते हैं।
4. लोक अदालत और समझौता
छोटे कर्जों (मुख्यतः ₹20 लाख से कम) के लिए लोक अदालतें लगाई जाती हैं जहां बैंक और कर्जदार समझौता करते हैं।
फायदा: जल्दी निपटान, कानूनी खर्च कम, दोनों पक्षों को कुछ न कुछ मिल जाता है।
5. Asset Reconstruction Companies (ARC)
- कार्य: ये कंपनियां बैंकों से NPA खरीद लेती हैं (कम कीमत पर) और फिर खुद वसूली करती हैं।
- प्रक्रिया: मान लीजिए एक बैंक का ₹100 करोड़ का NPA है। ARC इसे ₹30 करोड़ में खरीद लेगी। बैंक को तुरंत ₹30 करोड़ मिल गए और NPA की झंझट से मुक्ति। ARC अब वसूली करेगी और अगर ₹50 करोड़ वसूल कर ली तो उसका मुनाफा।
- उदाहरण: NARCL (National Asset Reconstruction Company Limited) - सरकार द्वारा बनाई गई "बैड बैंक"।
NPA कम करने के उपाय
1. कर्ज देने से पहले सावधानी
- उचित मूल्यांकन: कर्ज देने से पहले परियोजना की व्यवहार्यता, कर्जदार की साख, बाजार की स्थिति - सबकी गहन जांच।
- Collateral की सही कीमत: जो संपत्ति गिरवी रखी जा रही है, उसका सही मूल्यांकन जरूरी है।
- विविधीकरण: एक ही उद्योग या एक ही कर्जदार को बहुत ज्यादा कर्ज न देना।
2. कर्ज देने के बाद निगरानी
- नियमित जांच: यह देखना कि कर्ज का उपयोग सही जगह हो रहा है या नहीं।
- प्रारंभिक चेतावनी संकेत: अगर कोई कर्जदार एक-दो किस्त चूकता है तो तुरंत कार्रवाई।
3. सख्त कानून और त्वरित कार्रवाई
- IBC का प्रभावी उपयोग: जानबूझकर चूक करने वालों के खिलाफ तुरंत कार्रवाई।
- Wilful Defaulters की सूची: रिज़र्व बैंक जानबूझकर चूक करने वालों की सूची बनाता है। उन्हें नया कर्ज नहीं मिलना चाहिए, विदेश यात्रा पर रोक लगनी चाहिए।
4. कर्ज पुनर्गठन (Restructuring)
- अगर किसी genuine कर्जदार को अस्थायी समस्या है तो कर्ज की शर्तें बदली जा सकती हैं:
- • समय सीमा बढ़ाना • ब्याज दर कम करना • कुछ समय के लिए सिर्फ ब्याज की किस्त • अनुग्रह अवधि (moratorium period) देना
5. One Time Settlement (OTS)
- छोटे कर्जों के लिए बैंक समझौता करते हैं - कर्जदार मूलधन का कुछ हिस्सा चुका दे, ब्याज माफ कर दिया जाए।
6. कर्ज माफी (Loan Waiver)
- विवादास्पद: सरकार कभी-कभी कृषि कर्ज माफ करती है। यह राजनीतिक निर्णय होता है।
- नुकसान: इससे कर्ज चुकाने की संस्कृति खत्म होती है। अगली बार लोग सोचते हैं कि फिर माफ हो जाएगा।
- फायदा: किसानों को तात्कालिक राहत मिलती है।
भारत में NPA की स्थिति - ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
1990 के दशक
बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ था। सामाजिक उद्देश्य थे - गरीबों को कर्ज। लेकिन वसूली की व्यवस्था कमजोर थी। NPA धीरे-धीरे बढ़ने लगे।
2000 के दशक
आर्थिक उदारीकरण और तेज विकास का दौर। बैंकों ने बड़े उद्योगों को भारी कर्ज दिए। शुरुआत में सब ठीक रहा।
2008-2015
वैश्विक मंदी का असर। कई बड़ी परियोजनाएं रुक गईं। बिजली, सड़क, इस्पात - इन क्षेत्रों में भारी NPA। इस दौर को "Twin Balance Sheet Problem" कहा गया - बैंकों की balance sheet खराब, कंपनियों की भी खराब।
2016 के बाद
सरकार ने कई कदम उठाए:
• IBC कानून (2016) • बैंकों का पुनर्पूंजीकरण • NCLT (National Company Law Tribunal) की स्थापना • बैंकों का विलय - कमजोर बैंकों को मजबूत में मिलाना
परिणाम: NPA में धीरे-धीरे कमी आई। वसूली बढ़ी। बैंकों की स्थिति सुधरी।
परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण बिंदु
• NPA परिभाषा - 90 दिन से अधिक अवधि तक अवैतनिक कर्ज
• तीन श्रेणियां - उप-मानक (90 दिन-12 महीने), संदिग्ध (12 महीने से ज्यादा), हानि (अवसूली योग्य नहीं)
• प्रावधान - उप-मानक के लिए 15%, संदिग्ध के लिए 25-100%, हानि के लिए 100%
• SARFAESI Act - 2002, बिना अदालत संपत्ति जब्त करने का अधिकार
• DRT - Debt Recovery Tribunals, ₹20 लाख से ज्यादा के मामले
• IBC - Insolvency and Bankruptcy Code, 2016, समय सीमा 180+90 दिन
• Wilful Default - जानबूझकर चूक करना, क्षमता होते हुए न चुकाना
• ARC - Asset Reconstruction Companies, NPA खरीदकर वसूली
• NARCL - National Asset Reconstruction Company Limited, सरकारी बैड बैंक
• Twin Balance Sheet Problem - बैंक और कंपनी दोनों की खराब स्थिति
निष्कर्ष
NPA भारतीय बैंकिंग प्रणाली की सबसे बड़ी समस्या रही है। यह सिर्फ बैंकों का मसला नहीं है - यह पूरी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है। जब बैंकों का पैसा NPA में फंसता है तो नए कर्ज नहीं मिलते, निवेश रुकता है, रोजगार के अवसर कम होते हैं।
समस्या की जड़ें गहरी हैं - कर्ज देते समय उचित जांच न करना, राजनीतिक दबाव, भ्रष्टाचार, और सबसे बड़ी बात जानबूझकर चूक। बड़े-बड़े उद्योगपतियों ने हजारों करोड़ के कर्ज लेकर नहीं चुकाए और विदेश भाग गए। विजय माल्या, नीरव मोदी, मेहुल चोकसी - ये नाम इसी कहानी के अध्याय हैं।
लेकिन अच्छी बात यह है कि पिछले कुछ सालों में सुधार हुआ है। IBC कानून ने खेल बदल दिया। अब कर्जदारों को पता है कि कर्ज न चुकाने पर उनकी कंपनी का नियंत्रण छिन सकता है। बैंकों का विलय, पुनर्पूंजीकरण, बेहतर निगरानी - ये सब कदम सही दिशा में हैं।
लेकिन अभी बहुत काम बाकी है। कर्ज देने की प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए। वसूली तेज होनी चाहिए। जानबूझकर चूक करने वालों को सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए। तभी भारतीय बैंकिंग प्रणाली मजबूत होगी और देश का विकास तेज होगा।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रश्न 1: NPA क्या है और यह कब बनता है?
उत्तर: NPA (Non-Performing Asset) या गैर-निष्पादित परिसंपत्ति वह कर्ज है जिस पर उधारकर्ता ने 90 दिनों से अधिक समय तक न तो ब्याज चुकाया है और न मूलधन। जब कोई व्यक्ति या कंपनी लगातार 3 महीने तक किस्त नहीं चुकाती तो वह कर्ज NPA की श्रेणी में आ जाता है। पहले यह सीमा 180 दिन थी, लेकिन 2004 में रिज़र्व बैंक ने इसे घटाकर 90 दिन कर दिया ताकि समस्या का जल्दी पता चल सके।
प्रश्न 2: NPA के कितने प्रकार होते हैं?
उत्तर: NPA की तीन श्रेणियां हैं: (1) उप-मानक परिसंपत्ति - जब कर्ज 90 दिन से ज्यादा लेकिन 12 महीने से कम समय तक NPA रहे। इस पर 15% प्रावधान रखना पड़ता है। (2) संदिग्ध परिसंपत्ति - जब कर्ज 12 महीने से ज्यादा समय तक NPA रहे। इस पर 25-100% प्रावधान। (3) हानि परिसंपत्ति - जो पूरी तरह अवसूली योग्य नहीं, 100% प्रावधान। यह वर्गीकरण NPA की गंभीरता बताता है।
प्रश्न 3: NPA बैंकों के लिए समस्या क्यों है?
उत्तर: NPA कई कारणों से बैंकों के लिए समस्या है: (1) ब्याज की आय बंद हो जाती है, (2) बैंक को प्रावधान रखना पड़ता है जो मुनाफे से कटता है, (3) जो पैसा NPA में फंसा है वह नए कर्ज के रूप में नहीं दिया जा सकता, (4) बैंक की पूंजी पर्याप्तता अनुपात (Capital Adequacy Ratio) प्रभावित होता है, (5) बैंक की साख खराब होती है। अंततः यह पूरी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है क्योंकि साख सृजन कम होता है।
प्रश्न 4: SARFAESI Act क्या है?
उत्तर: SARFAESI Act 2002 में लाया गया था। पूरा नाम है - Securitisation and Reconstruction of Financial Assets and Enforcement of Security Interest Act। इस कानून के तहत बैंक बिना अदालत गए सीधे कर्जदार की गिरवी रखी संपत्ति को जब्त कर सकते हैं। पहले 60 दिन का नोटिस देना होता है। अगर कर्जदार जवाब नहीं देता तो बैंक संपत्ति का कब्जा लेकर नीलाम कर सकता है। लेकिन यह ₹1 लाख से कम के कर्ज और कृषि भूमि पर लागू नहीं होता।
प्रश्न 5: IBC कानून क्या है और यह क्यों महत्वपूर्ण है?
उत्तर: Insolvency and Bankruptcy Code (IBC) 2016 में लाया गया। यह क्रांतिकारी कानून है जिसने NPA समाधान की दिशा बदल दी। मुख्य विशेषताएं: (1) समय सीमा तय है - 180 दिन (एक बार 90 दिन बढ़ाया जा सकता है), (2) कंपनी का प्रबंधन मालिकों से लेकर resolution professional को दे दिया जाता है, (3) National Company Law Tribunal (NCLT) में मामला जाता है। महत्व: पहले मामले सालों अदालतों में लटकते थे, अब जल्दी समाधान होता है। कर्जदारों में डर पैदा हुआ है।
प्रश्न 6: Wilful Default क्या है?
उत्तर: Wilful Default या जानबूझकर चूक तब होती है जब कर्जदार के पास कर्ज चुकाने की क्षमता होते हुए भी वह जानबूझकर नहीं चुकाता। उदाहरण: (1) कर्ज का पैसा किसी और काम में लगा देना, (2) संपत्ति विदेश भेज देना, (3) कंपनी की संपत्तियां बेचकर पैसा हड़प लेना। रिज़र्व बैंक ऐसे defaulters की सूची बनाता है। उन्हें नया कर्ज नहीं मिलता, विदेश यात्रा पर रोक लग सकती है। विजय माल्या, नीरव मोदी - ये सब wilful defaulters की श्रेणी में आते हैं।
प्रश्न 7: Asset Reconstruction Companies (ARC) क्या करती हैं?
उत्तर: ARC वे कंपनियां हैं जो बैंकों से NPA खरीदती हैं और फिर खुद वसूली करती हैं। प्रक्रिया: मान लीजिए बैंक का ₹100 करोड़ का NPA है। ARC इसे ₹30 करोड़ में खरीद लेगी (heavily discounted)। बैंक को तुरंत ₹30 करोड़ मिल जाते हैं और वह NPA से मुक्त हो जाता है। ARC अब वसूली की कोशिश करेगी। अगर ₹50 करोड़ वसूल हो गए तो ARC का मुनाफा। NARCL (National Asset Reconstruction Company Limited) सरकार द्वारा बनाई गई "बैड बैंक" है जो बड़े NPAs खरीदती है।
प्रश्न 8: NPA कम करने के लिए क्या किया जा सकता है?
उत्तर: NPA कम करने के कई उपाय हैं: (1) कर्ज देने से पहले - परियोजना की सही जांच, कर्जदार की साख की पड़ताल, collateral का सही मूल्यांकन। (2) कर्ज देने के बाद - नियमित निगरानी, प्रारंभिक चेतावनी पर तुरंत कार्रवाई। (3) कानूनी - IBC का तेज उपयोग, wilful defaulters के खिलाफ सख्त कार्रवाई। (4) पुनर्गठन - genuine कर्जदारों को समय सीमा बढ़ाना, ब्याज दर कम करना। (5) समझौता - One Time Settlement, लोक अदालतें। (6) प्रणालीगत - बेहतर कॉर्पोरेट governance, पारदर्शिता।
प्रश्न 9: Twin Balance Sheet Problem क्या है?
उत्तर: Twin Balance Sheet Problem का मतलब है दोनों तरफ की समस्या - बैंकों की balance sheet भी खराब और कंपनियों की भी। यह 2012-2016 के दौरान गंभीर थी। बैंकों में भारी NPA थे - पैसा फंसा हुआ, नया कर्ज देने की क्षमता नहीं। वहीं कंपनियां (खासकर infrastructure, power, steel sectors में) कर्ज के बोझ तले दबी थीं - कर्ज चुका नहीं पा रहीं, नया निवेश नहीं कर पा रहीं। यह एक दुष्चक्र था - बैंक कर्ज नहीं दे रहे, कंपनियां निवेश नहीं कर पा रहीं, अर्थव्यवस्था धीमी पड़ रही थी।
प्रश्न 10: क्या कर्ज माफी NPA का समाधान है?
उत्तर: कर्ज माफी विवादास्पद मुद्दा है। फायदे: (1) कर्जदारों (खासकर किसानों) को तात्कालिक राहत, (2) राजनीतिक रूप से लोकप्रिय। नुकसान: (1) कर्ज चुकाने की संस्कृति खत्म होती है - अगली बार लोग सोचते हैं फिर माफ हो जाएगा, (2) जो ईमानदारी से चुका रहे हैं उन्हें बुरा लगता है, (3) बैंकों पर भारी बोझ, (4) राजकोष पर बोझ (सरकार बैंकों को मुआवजा देती है)। विशेषज्ञ कहते हैं कर्ज माफी के बजाय कर्ज पुनर्गठन, ब्याज सब्सिडी, फसल बीमा जैसे उपाय बेहतर हैं।
