Balance of Payments (BoP) क्या है? Current Account Deficit, Forex Reserve और Rupee Depreciation Explained”| 1991 & 2013 Crisis Analysis

 भुगतान संतुलन: जब रुपये की कीमत डॉलर के सामने गिरने लगे

Balance of Payments (BoP) क्या है? Current Account Deficit, Forex Reserve और Rupee Depreciation Explained”| 1991 & 2013 Crisis Analysis
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    2013 की गर्मियों का वह दिन। रिज़र्व बैंक के मुख्यालय में आपातकालीन बैठक चल रही थी। पर्दे पर एक ग्राफ दिख रहा था - डॉलर के मुकाबले रुपया लगातार गिर रहा था। ₹54, ₹56, ₹58... और फिसलन रुकने का नाम नहीं ले रही थी।

गवर्नर ने पूछा - "विदेशी मुद्रा भंडार की स्थिति क्या है?"

    एक अधिकारी ने जवाब दिया - "सर, तेजी से घट रहा है। Current Account Deficit बहुत ज्यादा है। सोना आयात बेकाबू हो गया है। कच्चे तेल की कीमतें आसमान पर हैं। विदेशी निवेशक पैसा निकाल रहे हैं।"

"तो क्या हमें 1991 जैसा संकट फिर देखना पड़ेगा?"

    कमरे में सन्नाटा छा गया। सबको 1991 की वह रात याद थी जब भारत को अपना सोना गिरवी रखना पड़ा था विदेशी मुद्रा की कमी के कारण।

    यह सिर्फ कुछ तकनीकी शब्दों की बात नहीं थी। यह देश की अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य का सवाल था। आज हम समझेंगे कि Balance of Payments (BoP), Current Account Deficit, Forex Reserve और Rupee Depreciation क्या हैं और ये आपस में कैसे जुड़े हैं।


Balance of Payments क्या है - परिभाषा

    Balance of Payments या भुगतान संतुलन एक देश के विश्व के बाकी देशों के साथ होने वाले सभी आर्थिक लेनदेन का हिसाब-किताब है। यह एक निश्चित अवधि (आमतौर पर एक वर्ष) में तैयार किया जाता है।

सरल शब्दों में: मान लीजिए भारत एक व्यक्ति है और बाकी दुनिया उसके दोस्त-रिश्तेदार। BoP वह रजिस्टर है जिसमें लिखा जाता है कि भारत ने दुनिया को कितना दिया (भुगतान किया) और दुनिया से कितना लिया (प्राप्त किया)।

BoP में क्या-क्या आता है?

  • आयात-निर्यात: हम चीन से मोबाइल खरीदते हैं (आयात), अमेरिका को सॉफ्टवेयर सेवाएं बेचते हैं (निर्यात)।
  • विदेशी निवेश: विदेशी कंपनियां भारत में निवेश करती हैं, या भारतीय कंपनियां विदेश में।
  • कर्ज और ब्याज: भारत ने विश्व बैंक से कर्ज लिया, उस पर ब्याज चुकाना पड़ता है।
  • प्रेषण (Remittances): खाड़ी देशों में काम करने वाले भारतीय घर पैसा भेजते हैं।


BoP के दो खाते - Current और Capital

Balance of Payments दो मुख्य भागों में बंटा है।

A) Current Account (चालू खाता)

यह वर्तमान लेनदेन का हिसाब है। इसमें चार चीजें आती हैं:

1. व्यापार संतुलन (Trade Balance):

• निर्यात - हम दुनिया को क्या बेचते हैं (सॉफ्टवेयर, कपड़ा, रत्न-आभूषण, दवाइयां) 

• आयात - हम दुनिया से क्या खरीदते हैं (कच्चा तेल, सोना, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी)

अगर निर्यात > आयात = व्यापार अधिशेष (Trade Surplus) अगर आयात > निर्यात = व्यापार घाटा (Trade Deficit)

भारत में आमतौर पर Trade Deficit रहता है क्योंकि हम बहुत कुछ आयात करते हैं।

2. अदृश्य मदें (Invisibles):

ये वे सेवाएं हैं जो दिखती नहीं लेकिन महत्वपूर्ण हैं:

• सेवाएं - IT सेवाएं, पर्यटन, परिवहन 

• आय - विदेशी निवेश पर मिलने वाला लाभांश, ब्याज 

• प्रेषण (Remittances) - विदेश में काम करने वाले भारतीयों का घर भेजा पैसा

    भारत के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है। IT सेवाओं और remittances से भारी आय होती है जो Trade Deficit को कुछ हद तक पूरा करती है।

3. एकतरफा हस्तांतरण:

दान, उपहार, विदेशी सहायता जिसके बदले कुछ नहीं मिलता।

Current Account का सूत्र:

Current Account = (निर्यात - आयात) + शुद्ध अदृश्य मदें + शुद्ध हस्तांतरण

B) Capital Account (पूंजी खाता)

यह पूंजी के प्रवाह का हिसाब है। इसमें आते हैं:

  • विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI): जब कोई विदेशी कंपनी भारत में फैक्ट्री खोलती है।
  • विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI): जब विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार में पैसा लगाते हैं।
  • बाहरी वाणिज्यिक उधार (ECB): भारतीय कंपनियां विदेशी बैंकों से कर्ज लेती हैं।
  • बैंकिंग पूंजी: बैंकों के विदेशी लेनदेन।


Current Account Deficit - जब खर्च आमदनी से ज्यादा हो

    Current Account Deficit (CAD) का मतलब है कि देश की Current Account में घाटा है। यानी हमने दुनिया को जितना दिया (निर्यात, सेवाएं), उससे ज्यादा दुनिया से लिया (आयात)।

CAD कैसे बनता है?

उदाहरण: मान लीजिए एक साल में:

• भारत ने $500 अरब का निर्यात किया • भारत ने $600 अरब का आयात किया • Trade Deficit = $100 अरब

• IT सेवाओं से $150 अरब की आय • Remittances से $80 अरब • कुल अदृश्य आय = $230 अरब

• विदेशी निवेश पर लाभांश भुगतान = $50 अरब • शुद्ध अदृश्य आय = $230 - $50 = $180 अरब

Current Account = -$100 (Trade) + $180 (Invisibles) = $80 अरब अधिशेष

लेकिन अगर कच्चे तेल की कीमत बढ़ जाए और आयात बढ़कर $700 अरब हो जाए, तो: Current Account = -$200 + $180 = -$20 अरब घाटा

यह है Current Account Deficit।

CAD क्यों समस्या है?

  • विदेशी मुद्रा की कमी: जब CAD होता है तो इसका मतलब है डॉलर जा रहे हैं, आ नहीं रहे। विदेशी मुद्रा भंडार घटता है।
  • रुपये पर दबाव: डॉलर की मांग ज्यादा, आपूर्ति कम। तो रुपया कमजोर होता है।
  • कर्ज बढ़ता है: CAD को पूरा करने के लिए विदेशी कर्ज लेना पड़ता है।
  • आर्थिक भेद्यता: अगर अचानक विदेशी निवेशक पैसा निकाल लें तो संकट आ सकता है।

CAD की स्वीकार्य सीमा

    आमतौर पर GDP का 2-3% तक CAD सुरक्षित माना जाता है। इससे ज्यादा खतरनाक। भारत में 2012-13 में CAD GDP का 4.8% तक पहुंच गया था - यह चिंताजनक था।


Forex Reserve - विदेशी मुद्रा भंडार

    Forex Reserve या विदेशी मुद्रा भंडार वह विदेशी मुद्रा है जो रिज़र्व बैंक के पास सुरक्षित रखी होती है।

Forex Reserve में क्या-क्या होता है?

  • विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियां: मुख्यतः अमेरिकी डॉलर, यूरो, पाउंड, येन।
  • सोना: रिज़र्व बैंक के पास भारी मात्रा में सोना भी है।
  • SDR (Special Drawing Rights): IMF द्वारा दी गई विशेष आहरण अधिकार।
  • IMF में आरक्षित स्थिति: IMF में भारत का कोटा।

Forex Reserve क्यों जरूरी है?

  • आयात के भुगतान: तेल खरीदना है, सोना आयात करना है - इसके लिए डॉलर चाहिए।
  • विदेशी कर्ज चुकाना: भारत ने जो विदेशी कर्ज लिया है, उसका ब्याज और मूलधन चुकाना होता है।
  • रुपये की कीमत स्थिर रखना: अगर रुपया बहुत तेजी से गिर रहा हो तो रिज़र्व बैंक बाजार में डॉलर बेचकर रुपये को संभाल सकता है।
  • आपातकालीन स्थिति: संकट के समय (जैसे युद्ध, महामारी) काम आता है।
  • विश्वास: ज्यादा Forex Reserve से विदेशी निवेशकों का विश्वास बढ़ता है।

कितना Forex Reserve चाहिए?

    एक सामान्य नियम है - Forex Reserve इतना होना चाहिए कि कम से कम 3 महीने के आयात का भुगतान हो सके। भारत का Forex Reserve आमतौर पर 9-12 महीने के आयात के बराबर रहता है, जो अच्छी स्थिति है।


Rupee Depreciation - रुपये का अवमूल्यन

Rupee Depreciation का मतलब है डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत का गिरना।

उदाहरण से समझें

2010 में: $1 = ₹45 2023 में: $1 = ₹83

यानी रुपया depreciate हुआ। पहले ₹45 देकर $1 मिलता था, अब ₹83 देना पड़ता है।

Rupee Depreciation क्यों होता है?

1. मांग-आपूर्ति का खेल: जब भारत को ज्यादा आयात करना है तो डॉलर की मांग बढ़ती है। मांग ज्यादा, आपूर्ति कम, तो डॉलर महंगा (यानी रुपया सस्ता)।

2. CAD बढ़ना: जब Current Account Deficit बढ़ता है तो बाजार में डॉलर की मांग बढ़ती है।

3. विदेशी निवेशकों का पैसा निकालना: अगर विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार से पैसा निकालें तो वे रुपये बेचकर डॉलर खरीदते हैं। इससे रुपया गिरता है।

4. तेल की कीमत बढ़ना: भारत अपनी जरूरत का 85% तेल आयात करता है। जब international market में तेल महंगा होता है तो ज्यादा डॉलर चाहिए। रुपया गिरता है।

5. अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ना: जब अमेरिका में Federal Reserve ब्याज दरें बढ़ाता है तो डॉलर में निवेश आकर्षक हो जाता है। निवेशक उभरते बाजारों (भारत) से पैसा निकालकर अमेरिका ले जाते हैं।

Rupee Depreciation के प्रभाव

सकारात्मक:

• निर्यात सस्ता होता है। भारतीय सामान विदेश में सस्ता, तो ज्यादा बिकेगा। 

• IT कंपनियों को फायदा। वे डॉलर में कमाती हैं, तो रुपये में ज्यादा मिलेगा। 

• पर्यटन को बढ़ावा। विदेशी पर्यटकों के लिए भारत सस्ता।

नकारात्मक:

• आयात महंगा। तेल, सोना, इलेक्ट्रॉनिक्स - सब महंगे। 

• मुद्रास्फीति बढ़ती है। महंगा तेल का मतलब महंगा परिवहन, महंगे सामान। 

• विदेशी कर्ज का बोझ बढ़ता है। अगर डॉलर में कर्ज है तो रुपयों में ज्यादा चुकाना पड़ेगा। 

• विदेशी शिक्षा महंगी। विदेश पढ़ने जाने वाले छात्रों की मुश्किल।


सब कैसे जुड़े हैं - पूरी तस्वीर

अब देखते हैं ये सब आपस में कैसे जुड़े हैं।

परिदृश्य 1: जब सब अच्छा चल रहा हो

• निर्यात बढ़ रहा है, IT सेवाओं से अच्छी कमाई 

• Current Account अधिशेष या कम घाटा 

• Forex Reserve बढ़ रहा है 

• विदेशी निवेश आ रहा है 

• रुपया स्थिर या मजबूत

परिदृश्य 2: संकट की ओर (2013 जैसी स्थिति)

• कच्चे तेल की कीमत आसमान पर → आयात बढ़ा → Trade Deficit बढ़ा • सोने का आयात बेकाबू → और घाटा 

• Current Account Deficit GDP का 4.8% हो गया 

• अमेरिका में Federal Reserve ने ब्याज दरें बढ़ाने की बात की → विदेशी निवेशक पैसा निकालने लगे 

• Forex Reserve तेजी से घटने लगा 

• डॉलर की भारी मांग → रुपया ₹68 तक गिर गया 

• आयात और महंगे → मुद्रास्फीति बढ़ी • एक दुष्चक्र शुरू

सरकार ने क्या किया (2013 में)?

• सोने के आयात पर कड़े नियम 

• अनिवासी भारतीयों के लिए विशेष बांड (जिनमें डॉलर मिले) 

• रिज़र्व बैंक ने ब्याज दरें बढ़ाईं (ताकि विदेशी निवेश रुके) 

• निर्यात को बढ़ावा देने के उपाय

धीरे-धीरे स्थिति संभली।


BoP संकट का इतिहास - 1991 का सबक

1991 भारतीय अर्थव्यवस्था के इतिहास का सबसे काला वर्ष था।

क्या हुआ था?

• खाड़ी युद्ध (1990-91) → तेल की कीमतें आसमान पर 

• विदेशी मुद्रा भंडार केवल 2 हफ्ते के आयात के बराबर 

• Current Account Deficit बहुत ज्यादा • कर्ज चुकाने में असमर्थ • विदेशी निवेशकों का विश्वास खत्म

आपातकालीन उपाय

• भारत को 47 टन सोना इंग्लैंड की बैंक ऑफ इंग्लैंड को गिरवी रखना पड़ा 

• IMF से कर्ज लेना पड़ा (शर्तों के साथ) 

• रुपये का अवमूल्यन (Devaluation) - एक बार में 18-19%

परिणाम

इस संकट के बाद भारत ने आर्थिक सुधार शुरू किए। 

1991 के बाद: • आर्थिक उदारीकरण • निजीकरण • विदेशी निवेश के लिए खुलापन • Forex Reserve बढ़ाने पर जोर

आज भारत का Forex Reserve $600 अरब के आसपास है। 1991 में यह $1 अरब से भी कम था।


कैसे बचा जाए संकट से

निर्यात बढ़ाना

• अच्छी गुणवत्ता के उत्पाद • नए बाजार खोजना • विनिर्माण को मजबूत करना (Make in India)

आयात कम करना

• ऊर्जा में आत्मनिर्भरता - सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा • सोने का आयात नियंत्रित करना • स्वदेशी उत्पादन बढ़ाना

विदेशी निवेश आकर्षित करना

• सुगम व्यवसाय वातावरण (Ease of Doing Business) • राजनीतिक स्थिरता • अच्छा बुनियादी ढांचा

Forex Reserve मजबूत रखना

• जरूरत से ज्यादा Forex Reserve • सोने का भंडार बढ़ाना • विवेकपूर्ण निवेश


परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण बिंदु

• BoP = Current Account + Capital Account

• Current Account = व्यापार संतुलन + अदृश्य मदें + हस्तांतरण

• CAD = जब Current Account में घाटा

• स्वीकार्य CAD = GDP का 2-3% तक

• Forex Reserve = विदेशी मुद्रा + सोना + SDR + IMF स्थिति

• Forex Reserve मानक = कम से कम 3 महीने के आयात के बराबर

• Rupee Depreciation = डॉलर के मुकाबले रुपये का कमजोर होना

• 1991 BoP संकट = सोना गिरवी रखना पड़ा

• 2013 Taper Tantrum = CAD बढ़ा, रुपया गिरा

• Trade Deficit ≠ CAD (अदृश्य मदें फर्क डालती हैं)


निष्कर्ष

    Balance of Payments एक जटिल लेकिन महत्वपूर्ण अवधारणा है। यह देश के आर्थिक स्वास्थ्य का थर्मामीटर है। जब BoP असंतुलित होता है - खासकर Current Account Deficit ज्यादा होता है - तो कई समस्याएं शुरू होती हैं।

    Forex Reserve घटता है क्योंकि आयात के लिए डॉलर जा रहे हैं। रुपया depreciate होता है क्योंकि बाजार में डॉलर की मांग ज्यादा है। मुद्रास्फीति बढ़ती है क्योंकि आयात महंगा हो गया। विदेशी निवेशक चिंतित होकर पैसा निकालने लगते हैं। एक दुष्चक्र शुरू हो जाता है।

    1991 का संकट हमें याद दिलाता है कि BoP को नजरअंदाज करने के क्या परिणाम हो सकते हैं। उस समय भारत को सोना गिरवी रखना पड़ा - राष्ट्रीय गौरव पर चोट। लेकिन उस संकट ने भारत को सबक सिखाया। आर्थिक सुधार हुए, विदेशी निवेश के दरवाजे खुले, निर्यात को बढ़ावा मिला।

आज भारत की स्थिति बहुत बेहतर है। Forex Reserve मजबूत है। IT और सेवा क्षेत्र विदेशी मुद्रा कमा रहे हैं। लेकिन चुनौतियां अभी भी हैं - तेल का आयात निर्भरता, सोने का प्रेम, व्यापार घाटा। इन पर लगातार नजर रखनी होगी।

    अंततः, एक स्वस्थ BoP के लिए जरूरी है - निर्यात बढ़ाना, अनावश्यक आयात कम करना, विदेशी निवेश आकर्षित करना, और Forex Reserve मजबूत रखना। यही सूत्र है आर्थिक सुरक्षा का।


अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

प्रश्न 1: Balance of Payments क्या है?

उत्तर: Balance of Payments (BoP) या भुगतान संतुलन एक देश के विश्व के बाकी देशों के साथ एक निश्चित अवधि (आमतौर पर एक वर्ष) में हुए सभी आर्थिक लेनदेन का व्यवस्थित रिकॉर्ड है। इसमें दो मुख्य खाते होते हैं: (1) Current Account - जिसमें वस्तुओं और सेवाओं का व्यापार, आय, प्रेषण शामिल, (2) Capital Account - जिसमें विदेशी निवेश, कर्ज, बैंकिंग पूंजी शामिल। BoP हमेशा शून्य होता है (गणितीय रूप से) क्योंकि हर भुगतान के बराबर प्राप्ति होती है।

प्रश्न 2: Current Account Deficit (CAD) क्या है और यह क्यों महत्वपूर्ण है?

उत्तर: Current Account Deficit तब होता है जब किसी देश का Current Account में घाटा होता है - यानी वस्तुओं और सेवाओं के आयात (और अन्य भुगतान) निर्यात (और प्राप्तियों) से ज्यादा हैं। सरल शब्दों में, देश दुनिया को जितना दे रहा है उससे ज्यादा ले रहा है। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि: (1) विदेशी मुद्रा भंडार घटता है, (2) रुपये पर दबाव बढ़ता है, (3) विदेशी कर्ज बढ़ता है, (4) आर्थिक भेद्यता बढ़ती है। GDP का 2-3% तक CAD सुरक्षित माना जाता है।

प्रश्न 3: Forex Reserve क्या है और यह क्यों जरूरी है?

उत्तर: Forex Reserve या विदेशी मुद्रा भंडार वह विदेशी मुद्रा (मुख्यतः अमेरिकी डॉलर) और अन्य परिसंपत्तियां (सोना, SDR) हैं जो रिज़र्व बैंक के पास सुरक्षित रखी होती हैं। यह जरूरी है क्योंकि: (1) आयात के भुगतान के लिए, (2) विदेशी कर्ज चुकाने के लिए, (3) रुपये की कीमत को स्थिर रखने के लिए, (4) आपातकालीन स्थिति में, (5) विदेशी निवेशकों का विश्वास बनाए रखने के लिए। एक सामान्य नियम है कि Forex Reserve कम से कम 3 महीने के आयात के बराबर होना चाहिए।

प्रश्न 4: Rupee Depreciation क्या है और इसके क्या प्रभाव हैं?

उत्तर: Rupee Depreciation का मतलब है डॉलर (या अन्य विदेशी मुद्राओं) के मुकाबले रुपये की कीमत का गिरना। उदाहरण: अगर $1 = ₹70 से बढ़कर $1 = ₹80 हो जाए तो रुपया depreciate हुआ। सकारात्मक प्रभाव: (1) निर्यात सस्ता और प्रतिस्पर्धी, (2) IT कंपनियों को फायदा, (3) पर्यटन बढ़ता है। नकारात्मक प्रभाव: (1) आयात महंगा (तेल, सोना), (2) मुद्रास्फीति बढ़ती है, (3) विदेशी कर्ज का बोझ बढ़ता है, (4) विदेशी शिक्षा महंगी होती है।

प्रश्न 5: Trade Deficit और Current Account Deficit में क्या अंतर है?

उत्तर: Trade Deficit सिर्फ वस्तुओं के व्यापार का घाटा है (आयात > निर्यात)। Current Account Deficit में Trade Deficit के साथ-साथ सेवाओं का व्यापार, आय, प्रेषण भी शामिल होते हैं। उदाहरण: भारत में आमतौर पर Trade Deficit होता है (बहुत आयात), लेकिन IT सेवाओं और remittances से अच्छी आय के कारण Current Account Deficit कम हो जाता है या कभी-कभी अधिशेष भी हो जाता है। यानी Trade Deficit होना जरूरी नहीं कि CAD हो।

प्रश्न 6: 1991 का BoP संकट क्या था?

उत्तर: 1991 में भारत गंभीर Balance of Payments संकट से गुजरा। मुख्य कारण: (1) खाड़ी युद्ध से तेल की कीमतें बढ़ीं, आयात महंगा, (2) बहुत ज्यादा Current Account Deficit, (3) Forex Reserve केवल 2 हफ्ते के आयात के बराबर, (4) विदेशी कर्ज चुकाने में असमर्थ। समाधान: भारत को 47 टन सोना इंग्लैंड की बैंक ऑफ इंग्लैंड को गिरवी रखना पड़ा, IMF से कर्ज लिया (शर्तों के साथ), रुपये का अवमूल्यन किया। परिणाम: आर्थिक सुधार शुरू हुए - उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण।

प्रश्न 7: रुपया कमजोर क्यों होता है?

उत्तर: रुपया कमजोर होने (depreciate) के मुख्य कारण: (1) मांग-आपूर्ति - जब भारत को ज्यादा आयात करना हो तो डॉलर की मांग बढ़ती है, रुपया कमजोर होता है, (2) CAD बढ़ना - घाटा बढ़े तो डॉलर की जरूरत, (3) विदेशी निवेशकों का पैसा निकालना (FPI outflow), (4) कच्चे तेल की कीमत बढ़ना - भारत 85% तेल आयात करता है, (5) अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ना - डॉलर में निवेश आकर्षक हो जाता है, (6) भू-राजनीतिक अनिश्चितता।

प्रश्न 8: क्या CAD हमेशा बुरा होता है?

उत्तर: जरूरी नहीं। अगर CAD कम है (GDP का 2-3% तक) और यह उत्पादक निवेश के लिए है तो यह स्वीकार्य है। उदाहरण: अगर भारत मशीनरी, तकनीक आयात कर रहा है जो भविष्य में उत्पादकता बढ़ाएगी तो यह CAD ठीक है। लेकिन अगर CAD ज्यादा है (4-5%) और यह सोने जैसी अनुत्पादक चीजों के आयात से है, या केवल उपभोग के लिए है, तो यह चिंताजनक है। साथ ही, अगर CAD को पूरा करने के लिए स्थिर पूंजी (FDI) आ रही है तो बेहतर, लेकिन अस्थिर पूंजी (FPI) से खतरा।

प्रश्न 9: भारत अपने Forex Reserve का प्रबंधन कैसे करता है?

उत्तर: भारतीय रिज़र्व बैंक Forex Reserve का प्रबंधन करता है। मुख्य उद्देश्य: (1) सुरक्षा - पैसा सुरक्षित रखना, (2) तरलता - जरूरत पड़ने पर तुरंत उपलब्ध, (3) प्रतिफल - कुछ आय भी हो। RBI यह Reserve मुख्यतः अमेरिकी सरकारी प्रतिभूतियों (Treasury Bonds) में निवेश करता है क्योंकि वे सुरक्षित हैं। कुछ हिस्सा सोने में, कुछ अन्य मुद्राओं में। RBI समय-समय पर विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप भी करता है - अगर रुपया बहुत तेजी से गिर रहा हो तो डॉलर बेचता है, अगर बहुत तेजी से मजबूत हो रहा हो तो डॉलर खरीदता है।

प्रश्न 10: IT सेवाएं और Remittances भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण हैं?

उत्तर: IT सेवाएं और Remittances भारत के Current Account के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये Trade Deficit को पूरा करने में मदद करते हैं। Trade Deficit: भारत वस्तुओं का आयात ज्यादा करता है (तेल, सोना, इलेक्ट्रॉनिक्स) और निर्यात कम। यह घाटा आमतौर पर $150-200 अरब का होता है। IT सेवाएं: भारतीय IT कंपनियां (TCS, Infosys, Wipro आदि) विदेशों को सेवाएं देती हैं और डॉलर कमाती हैं - लगभग $150 अरब सालाना। Remittances: विदेश में काम करने वाले भारतीय (खासकर खाड़ी देशों में) घर पैसा भेजते हैं - लगभग $80-100 अरब। ये दोनों मिलकर Trade Deficit को काफी हद तक पूरा कर देते हैं, इसलिए CAD कम रहता है।

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